Thursday, August 27, 2009

मनमोहन उचाव

आदरणीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ने तारीख २५_८_०९ को सी ,बी ,आई ,और एंटी करप्सन के एक अधिवेशन में अधिकारियों को नेक सलाह दी की वो बड़ी बड़ी मछलियों पर हाथ डाले ,और अपने गिरहबान में भी झाँककर देंखे ,यद्यपि प्रधानमंत्री जी का सुझाव प्रंशसनीय है परन्तु आज देश में छोटी मछलियाँ भी तो करप्सन के मामलात में कम नहीं हैं ,और सबसे बड़ी बात ये है की जो छोटी या बड़ी करप्ट मछलियाँ राजनीतिज्ञों के वर्धस्तों ,यानी के छाँव में पल पोश कर बड़ा हो रहीं हैं उनसे सी ,बी ,आई के अधिकारी या ई ,ओ ,डब्लू ,अथवा एंटी करप्सन ,डिपार्टमेंट कैसे निपटे क्योंकि अधिकारी वर्ग जैसे ही उनके ख़िलाफ़ एक्सन लेता है वैसे ही या तो मंत्रियों या सांसद ,विधायक अथवा पार्षद या छुटभैये नेताओं के द्वारा फोन ,सिफारिशी पत्र आने शुरू हो जाते हैं बल्कि यहाँ तक देखा गया है की वो लोग सिफारिशी पत्र तो प्रधानमंत्री कार्यालय हीनहीं बल्कि राष्ट्रपति कार्यालय तक से ले आते है .अब प्रधानमन्त्री जी आप ख़ुद सोचिये की इतने बड़े बड़े नेताओं के पत्र देखकर भला अधिकारी का क्या हाल होगा ,आप स्वयम सोचिये की क्या कोई अधिकारी उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ जा सकता है अथवा उसकी रिपोर्ट ग़लत दे सकता है या किसी शरीफ व्यक्ति को न्याय मिल सकता है ,मेरे विचारों में तो नही आख़िर उन अधिकारियों के भी बाल बच्चे हैं ,इसलिए वो अधिकारी उन सिफारिशी पत्रों को फाइल में लगा कर उस काम की या उस व्यक्ति की कार्यवाही को समाप्त कर देते हैं मेरा ख़ुद का एक जानने वाला है जो की ऐसे ही काम करता परन्तु दिल्ली का कोई भी डिपार्टमेंट उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाटा क्योंकि जैसे ही उसको पता लगता है की कोई डिपार्टमेंट का अधिकारी उसका काम उसके कहने के मुताबिक नहीं करता तो वो उस डिपार्टमेंट के उच्च अधिकारी के नाम सिफारिशी पत्र ,दिल्ली की मुख्यमंत्री ,किसी भी केन्द्रीय मंत्री ,प्रधानमन्त्री के कार्यालय ,राष्ट्रपति के कार्यालय ,उपराज्यपाल तक से लाकर लगा देता है अब सोचिये जिस आदमी की फाइल में इतने बड़े बड़े नेताओं के पत्र लगे होंगे उसके विरुध्ध भला कोई कैसे जा सकता है ,और जो उस आदमी की बात नहीं मानता उसे नौकरी तक से निलंबित करा देता है उसी के ऊपर रिश्वत तक लेने का आरोप लगा देता हैं उसका हाल तो ये है की उसके कार्यालय तक में जाकर उस व्यक्ति की बेइज्जत तक करता है ,इसलिए आदरणीय पी ,एम् ,साहब से मेरी प्रार्थना है की अगर वो कप्सन से निजात दिलाना चाहते हैं अथवा अधिकारियों से चाहते हैं की वो निष्पक्ष और इमानदारी से काम करें तो ये पत्र देने बंद करें और करवाएं ,वरना अधिकारी वर्ग कुछ नहीं कर पायेगा और घुट घुट कर मरता रहेगा बाकी जैसा आप उचित समझें

Monday, August 24, 2009

जसवंत की किताब का भूत

जसवंत सिंह जी ने अपनी किताब का उदघाटन ऐसे वक्त में करवाया जब की भारतीय जनता पार्टी में चुनावी हार को लेकर आरोप प्र्त्याक्शारोप का दौर पहले से ही चल रहा है ,इस किताब मैं जिन्ना साहब की तारीफ़ ने पार्टी तोड़ में आग में घी का काम किया है ,हम ये नहीं समझ पा रहे की जसवंत सिंह जी जैसे समझदार व्यक्ति ने ऐसा काम किससे प्रेरणा लेकर किया ,जब की अब से ४ वर्ष पूर्व वो अडवानी जी का हाल भली भांति देख चुके हैं ,जब का लगा दाग अडवानी जी अभी तक नहीं छूता सके तो फ़िर जसवंत सिंह जी को क्या कोई शौक था की ख़ुद को बेमतलब दाग लगाने के लिए किताब का विमोचन और उस पर भी जिन्ना साहब का चित्र ,आख़िर माजरा क्या था क्या वो ऐसा मुस्लिम वोटों के लिए कर रहे थे या जहाँ से वो चुनकर आए हैं वहाँ पर कुछ ज्यादा मुस्लिम भाई हैं ,यदि ठीक प्रकार से देखा जाए तो जसवंत सिंह जी ने भी अपने पैर पर ख़ुद ही कुल्हाडी से वार किया है है और जब वार कर ही लिया है तो फ़िर भरो दंड ,यद्यपि जीवन के ३० वर्ष किसी भी पार्टी के साथ बिताने और फ़िर दूध से मक्खी की तरह निकालन ,लगता तो अटपटा है है यद्यपि वो इसके हकदार भी हैं फ़िर भी पार्टी के नुक्सान और उनकी पहली गलती को मद्दे नजर रखते हुए राजनाथ सिंह जी को चाहिए की वो उनको पार्टी से ना निकाले ,और फ़िर से चेतावनी देकर गले से लगा लें ,इसी में सबकी भलाई है वरना जिस तरह से एक एक करके बुजुर्ग नेता पार्टी से बहार होते जा रहे हैं वो देश और पार्टी के हित मैं नहीं है ,कहीं इन सभी नेताओं ने उमा भरती के साढ़ मिलकर नै पार्टी बना ली तो नै मुसीबत भी खड़ी हो सकती है इस लिए अंहकार त्यागो और एक हो जाओ