देश में मझोले एवं छोटे उद्योगों की संख्या लगभग १.२८ करोड़ है जिनमे लगभग ३.१२ करोड़ लोग काम कर रहे हैं इनमे से ९०%छोटे उद्योगों से सम्बंधित हैं ये उद्योग देश के विनिर्माण उत्पादन में ३९% का योगदान कर रहे हैं ,कुल निर्यात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी ४०% है ,पिछले साल अक्टूबर के बाद से इन उद्योगों की मांग में लगभग ३०% की कमी हुई है खरीददारों से भुगतान रुकने के कारण भी इन्हे समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है ,इससे वो बैंकिंग वितरण ,और वित्तीय सम्बन्धी परेशानियों से दो चार हो रहे हैं बल्कि पिछडे क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि विकसित क्षेत्रों में भी जैसे टेक्सटाइल ,ज्वेल्लारी इंजिनीरिंग ,लेठेर ,रबर प्लास्टिक ,ओतोमोबिले ,चेमिकाल्स आदि उद्योगों की इकाइयां बेहाल हो रही हैं ,एस एम् ई पर अध्ययन करने वाले संगठन मिलाग्री बिजनेस एंड नालेज सॉल्यूशन पी लिमिटिड की रिपोर्ट के मुताबिक मंदी के बावजूद देश के लगभग ९७% ऐसे उद्योग भर्ष्टाचार या रिश्वत खोरी के शिकार हो रहे हैं यानी की मंदी की मार झेलने के बावजूद भी उन्हें घूसखोरी में रियायत नहीं मिल रही ,इन उद्योगों की ७०या ८०% इकाइयां सरकारी नीतियों और राहत एवं सुविधाओं से अनजान हैं और ६५%इकाइयां बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दिक्कतों का सामना कर रही हैं
भारत सरकार के अध्ययन के अनुसार मंदी की मार के कारण छोटे और मझोले उद्योगों का उत्पादन घाट रहा है क्योकि डिमांड है ही नही जिसके कारण उद्योगों से मजदूरों की छटनी हो रही है और बहुत बड़ी संख्या में मजदूर बेरोजगार हो रहे है है अब बच्चे तो उन्होंने ने भी पालने हैं जिसके लिए या तो वो अपराध करने की और भाग रहे हैं या आत्महत्या तक कर रहे हैं ,और सरकार के पास भी इसका कोई कारगर उपाय भी नहीं है ,अत; हमारी सरकार से करबद्ध प्रार्थना है की वो किसी भी प्रकार इन गरीब और असाही मजदूरों की भरपूर सहायता करे और अगर सरकार समझती है की मुमकिन है तो मंदी के समय तक और नहीं कुछ बेरोजगारी भत्ता ही बाँध देवे ताकि उनका और उनके बच्चों का गुजारा तो हो (कुछ समाचार ,समाचार पत्र सहयोग से )
Friday, February 27, 2009
Tuesday, February 24, 2009
न्यायालयों में देरी के कारण (भारत के लोत्न्त्र में )
न्यायालयों की शिथिलता ,अक्र्मंडयता ,परिवर्तनशीलता, तारीखों में दीर्घ्कालिन्ता ,महँगी न्याय प्रकिर्या ,और भी बहुत सी बातें है जिनके कारण आज किसी भी अच्छे शरीफ और इमानदार आदमी को या तो न्याय मिलता नहीं और अगर मिलता भी है तो तब जब किउसका पूरी तरह शोषण नहीं हो जाता ,यद्यपि कोर्ट कचहरी के बारे में बहुत सी कहावतें संसार में प्रचलित हैं जैसे कि कोर्ट कचहरी जाकर आज तक किसी को कुछ मिला है या कोर्ट कचहरी जाने से तो अच्छा है कि आदमी दो रोटी सूखी खा ले ,या जिसने फैसला ना करना हो तो कोर्ट कचहरी चले जाओ ,आज ही मैंने पेपर न्यूज़ पेपर में पढा कि १५ या २० साल से मुकद्दमे कोर्ट्स में पड़े हैं पर फेसले ही नही हुए ,फैसला तो तभी होगा जब न्यायाधीश करना चाहेगा या सामने वाली पार्टी करना चाहेगी वरना तो तारीख पर तारीख पड़ती जायेंगी ,वैसे भी आज रिट,सुइट ,या एंटीसिपेट्री बेल केलिए केस डालने का कोई ओचित्य नही है क्योंकि सभी में तारीख पर तारीख कोर्ट देता रहता है जैसे कि कोई आदमी ने एंटीसिपेट्री बेल के लिए कोर्ट गया परन्तु आज तक एक वर्ष होने को है और १२ तारीखें पड़ चुकी हैं कि वो व्यक्ति सभी कानूनी प्रकिर्या पूरी कर चुका है परन्तु फ़िर भी एक बेईमान व्यक्ति उसको बेल नही लेने देता जब कि केस स्टेट का है परन्तु उसने प्राइवेट एंट्री लेकर अपने दो दो वकील बेमतलब खड़े कर रखे है है ,और कोर्ट में उन्ही कि बात सुनी जाती है क्योंकि वो सीनियर वकील हैं ,वो बार बार तारीखे मांगते है तो जज उनको तारीख दे देते है अब ये तो जज ही जाने कि उनकी ऐसी क्या मजबूरी है कि न्याय प्रकिर्या एक तरफ रखकर काम हो रहा है , दूसरी और सुनिए जहाँ कि प्लानटिफ कि बात सुनी जानी चाहिए वहाँ आज न्याय्याल्यों में विरोधी कि बात सुनी जाती है ,यदि कोई आज आपका मकान कब्जा ले तो भाई कोर्ट में ना जाना वहीं कुछ ले दे कर फेसला कर लेना या किसी तरह से भी खाली करा सको तो करा लेना वरना कोर्ट चले गये तो केस डालोगे उसके कब्जे वाली जगह पर ,और उसके पैसे यानी के फीस भी तुम जमा करोगे और जज साहब स्टेको दे देंगे सामने वाले को पूरी कोठी पर ,फ़िर आप कुछ भी करने के नही रहोगे यद्यपि कानूनन तरीके से स्टेको उसी पोर्शन पर दिया जाना चाहिए जो विवादित है या जिसकी फीस जमा हुई है नाकि सम्पूर्ण प्रोपर्टी पर ,पर अब जज साहब से पूछे कौन ,या उसके लिए फ़िर जाओ उच्च न्यायालय ,उसके लिए फ़िर मोटे नोट्स चाहिए ,या फ़िर चुप चाप पड़े रहो आपका मकान घिर गया सो घिर गया ,है ना अंधा क़ानून भारत के लोकतंत्र में मई तो आपसे प्रार्थना करूंगा कि आप कभी भी कोर्ट मत जाओ चाहे मर क्यों ना रहे हो क्योंकि वहाँ कुछ नही होने वाला या ये कहिये कि न्याय मिलने वाला नही है किसी भी कोस्ट पर ,हाँ यदि कोई आप पर केस दाल दे तो चले जाओ ,किराए दार ने भी मकान पर कब्जा कर लिया हो तो भी नही जाना किरायेदार को ही कुछ देकर निकाल देना आपके हित में रहेगा क्योंकि आप उसे निकलवाने जाओगे और वो कोर्ट में मिलकर आपको ही फेंसा देगा फ़िर आप क्या करोगे ,,,,,,,
Saturday, February 21, 2009
लोकतंत्र में भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार दिन प्रितिदीन बढता ही जा रहा है ,कोई भी सरकारी कार्यालय अथवा सार्वजनिक संस्थान इससे अछूता नही है आये दिन कोई ना कोई बड़ा अधिकारी या छोटा अधिकारी सी ,बी ,आई ,,एंटी करप्शन ,,या इकनॉमिक ओफ्फेंस के हत्थे चदता ही रहता है ,ये भी वास्तविकता है की आज किसी भी कार्यालय मेंबिना रिश्वत या सुविधा शुल्क दिए कोई भी कार्य संपन्न नही हो पाता और जो व्यक्ति सम्बंधित अधिकारी को रिश्वत नही देता तो या तो उसका कार्य ही नही किया जाता अथवा कार्य इतना बिगाड़ दिया जाता है की वो किसी भी उच्च अधिकारी के पास चला जाए या सिफारिस भी ले आये तो सीधा काम सीधा नहीं हो सकता बल्कि उस व्यक्ति को फंसा दिया जाता है और वो फ़िर कसम खाता है कि भविष्य में सभी कार्य रिश्वत देकर ही कराएगा ,यद्यपि ये रिश्वत का सिलसिला कोई एक पॉइंट पर ही नहीं है बल्कि प्रत्येक पॉइंट पर है ,छोटे अधिकारियों में रिश्वत का माहोल बहुत गर्म है क्योंकि वो कहते है कि हमाम में सभी नंगे है फ़िर डर काहे का ,ऊपर के अधिकारियों में इमानदार अधिकारियों कि संख्या अधिक है जब कि नीचे वालों में बेईमानो कि संख्या तो ९० %है और ये माहौल तो तब है जब कि सभी दफ्तरों में रिश्वत ना देने के बोर्ड लगे हैं और लिखा है कि रिश्वत देना या लेना दोनों ही क़ानून कि निगाह में जुर्म है पर कोई नही मानता ना देने वाला और नाही लेने वाला ,अत;हमारी भ्रष्टाचार रोकने वाले सभी संस्थाओं से प्रार्थना है कि वो थोडा और सख्ती से पेश आये तभी इस पर काबू पाया जा सकता है यद्यपि ये भ्रष्टाचारियों कि नस नस में बस चुका है
लोकतंत्र की न्याय प्रक्रिया में पुलिस की भूमिका
लोकतान्त्रिक व्यवस्था में न्याय प्रकिर्या को व्यवस्थित करने में मुख्य भूमिका पुलिस की है ,क्योंकि किसी भी अन्याय को दण्डित प्रक्रिया से सम्बंधित करने की शुरुआत पुलिस थाने से ही होती है ,पुलिस जो कुछ भी उलटा सीधा समझकर ऍफ़ .आई आर में दर्ज कर बिना सोचे समझे धाराओं का प्रयोग करती है ,पूरी न्याय व्यवस्था उसी के आधार पर चलती है ,न्यायाधिकारी की सम्पूर्ण सोच उन धाराओं को आधार मानकर चलती है और जहाँ तक धाराओं की बात है वो तो ऍफ़ आई ,आर दर्ज कराने वाले के ऊपर आधारित है वो जितना मीठा डालता है उतनी ही सख्त या ज्यादा सजा वाली धाराए सामने वाले पर थोप दी जाती हैं और फ़िर सामने वाला एडियाँ रगड़ -रगड़ कर कोर्ट कचहरी के चाक्कर लगाता -लगाता अपना धन धान्य लुटाता जिन्दगी भर लगा रहता है पर उसको न्याय नहीं मिलता आनंद की बात ये है की पुलिस वाले जिनको क़ानून का तनिक भी ज्ञान नही होता मात्र एक छोटी सी धाराओं की किताब को देखकर या अधिक मीठा खाकर ,बिना उच्च अधिकारियों की सलाह के एक मामूली सा एस ,आई ,जिसको आई ,ओ (इन्वेस्तीगेशन आफिसर ) कहा जाता है वो मामूली से मामूली केस में चाहे वो दो भाइयों की लड़ाई ही क्यों ना हो या छोटा मोटा प्रापर्टी विवाद ही क्यों ना हो अधिक से अधिक मीठा खाकर ऐसी धाराए ऍफ़ ,आई ,आर में लिख देता है की जीवन भर फेसला ही ना हो जैसे की एक केस में मैंने देखा है की एक बेईमान भाई के कहने मात्र से मामूली प्रापर्टी विवाद में अधिक मीठा खाकर आई ,ओ ने धारा ४२०,१२०ब,३६७,४६८,५११ लगाकर केस दर्ज करा दिया और जब बड़े -बड़े अधिकारियों से विक्टिम ने बातचीत की तो वो शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे और पूरा भांडा आई ,ओ, के सिर पर फोड़ रहे थे यानी की वी बेचारे उसमे कुछ भी करने की पोजीसन में नहीं थे अब आप सोचिये की जब उच्च अधिकारी उसी डिपार्टमेंट के कुछ नही कर सकते तो न्यायालय के अधिकारी ही क्यों उन धाराओं पर सिर खपाई करेंगे उनको तो लड़ने वालो के वकील जो समझायेंगे उसी के आधार पर फैसला देंगे अब चाहे उसमे कोई भी मारा जाए आई ,ओ ने तो मोटी मोटी धाराए लगाकर अपने कार्य की इतिश्री कर दे पर यदि न्यायाधिकारी धारा लगाने वाले आई ,ओ, को पूछें की धाराए किस आधार पर उसने लगाई हैं तो फ़िर शायद वो डरकर ठीक ही धाराओं का प्रयोग करेगा क्योंकि उसको अपनी खिंचाई की परवाह होगी पर वो तो मनमर्जी से धारा लगाकर ,परेशानी खड़ी करके छुट्टी पा लेता है मेरे हिसाब से ५०%मुकद्दमे तो झूठे ही बनवाकर कोर्ट में दाल दिए जाते हैं और उसमे कितने मासूम और निरीह व्यक्ति सजा पा जाते हैं शायद कोई नहीं जानता यद्यपि वकीलों की बहस के आधार पर जज अपनी और से पूरी तरह न्याय करने की कोशिश करते है पर उन झूटी धाराओं के आधार की वजह से केसेस बहुत लंबे समय तक चलते रहते है अत; इमानदार और कम पैसे वाला या तो टूट जाता है या मजबूरी में आई, ओ, के मुताबिक फेसला कर लेता है अब कटेगा तो छुरी से खरबूजा ही ,छोरी का तो कुछ बिगडेगा नहीं ,अत; हमारी पुलिस के उच्च अधिकारियो से भी प्रार्थना है की उनको केस दर्ज होने पर जो धाराएं लगाई जाती उनको मात्र आई ,ओ, के ऊपर ना छोड़ कर अपनी दखलंदाजी भी करे जो विक्टिम ,लोकतंत्र ,और न्याय व्यवस्था के लिए हितकर साबित होगा और जो उंगलियाँ पुलिस पर भी उठती है वो भी बंद हो जायेगी
Monday, February 16, 2009
भारतीय लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था
हमारे देश में न्याय पाने की प्रकिरिया इतनी दुरूह ,कठिन ,लम्बी ,और महंगी है कि साधारण व्यक्ति तो क्या मध्यम दर्जे का नागरिक भी न्याय पाने में असमर्थ है और जब ये ही नागरिक असमर्थ हैं तो गरीब आदमी कि तो बिसात ही क्या है ,अब चाहे वो गरीब व्यक्ति न्यायालयों के चक्कर लगाए अथवा सरकारी या गेर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता रहे या कारागार में पडा सड़ता रहे उस बेचारे को तो भगवान् के सिवा कोई न्याय दे नही सकता यद्यपि लोकादाल्तें भी चल रहीं हैं परन्तु वहा पर भी तो बेठे न्यायाधिकारी ही हैं ,वो भी किसी ना किसी से प्रभावित हो ही जाते है अब सोचिये गरीब आदमी का प्रभाव तो इतने बड़े -बड़े अधिकारियों पडेगा नही ,बल्कि मेने तो कितने ही बार ऐसा भी देखा है कि वो गरीब अपनी बात कह भी नही पाटा और डांट कर चुप करा दिया जाता है ,हालांकि सविधान में प्रावधान है कि यदि कोई गरीब व्यक्ति सरकार से फ्री में वकील चाहता है तो उसको वकील मिल सकता है पर उसकी प्रकिर्या भी बहुत लम्बी होती है दुसरे ये बात भी सभी लोग जानते है कि ये सरकारी वकील कितने काबिल और अच्छे होते हैं ,इनका तो मिलना या ना मिलना ना होने के बराबर है ,अत; सरकार यदि वास्तव में गरीबों को न्याय दिलवाना चाहती है तो कानूनी प्रकिर्या को छोटी कराये अथवा जजों को चाहिए कि वो स्वयम दोनों पक्षों को अकेले अपने चेम्बर में बुलाकर मिडीएशन करके न्याय दे ,अथवा केश कि पैरवी ख़ुद वो ही लोग करे जो केश लड़ रहे हैं ,वकील भी साथ होने चाहिए ताकि क़ानून कि बातें वो समझा सके ,इन सभी बातों के होने से हम समझते हैं कि प्रत्येक गरीब को न्याय मिल सकेगा और कोर्टों में जो लंबित केश बहुतायत में पड़े हैं उनसे भी सरकार कि निजात मिल जायेगी तब शायद गरीब बोलेगा जय भारत जय लोकतंत्र ,वैसे यदि चहुँ और द्रष्टि डाली जाए तो भारत में हर नागरिक के लिए न्य्याय पाना कठिन ही नही बल्कि दुर्लभ है
Thursday, February 12, 2009
हमारा लोकतंत्र
हमारे लोकतंत्र को यदि परिभाषित किया जाए तो नतीजा निकलेगा की उसे भ्रष्टतंत्र कहेंगे ,फंड के नाम पर करोडो रूपये जनसेवकों को प्रितिवर्ष दिए जाते हैं जेसे की दो -दो करोड़ रूपये प्रतिवर्ष कौंसलर ,विधायक और सांसद को अपने -अपने क्षेत्रों में डवलपमेंट करने हेतु सरकार देती है परन्तु आप जाकर मुआयना करे तो वो ही टूटी फूटी सड़के,गंदे नाले ,सिविर व्यवस्था की जर जर हालत ,बिजली की किल्लत ,पानी का बुरा हाल ,पार्कों के नाम पर खाली पड़ी जमींन आवारा कुत्तों की भरमार ,कतार बसे ,जानवरों की भाँती बसों में सफर करते लोग ,भ्रष्ट नोकर्शाहों और राजनीतिज्ञों का चेहरा उजागर करती नजर आएँगी ,इनको जितना भी कोसा जाए उतना हिउ कम ,
Tuesday, February 10, 2009
विधान सभा में अनुशासन हीनता क्या लोकतंत्र का रूप है
भारत में लोकतंत्र की जड़े कितनी मजबूत है ,और लोकतंत्र के कारण अनुशासन की गरिमा कितनी बची है ,आज उत्तर प्रदेश विधान सभा में राज्यपाल के ऊपर कागज़ के गोले बना बना कर मारे गये ज़रा सोचिये कितनी शर्मनाक घटना है ,मेरा तो शर्म की वजह से सिर झुका जा रहा है परन्तु जिन मेंबर ऑफ़ लेगिस्लेतिवने ऐसा तुच्छ कार्य किया उन लोगो की तो सदस्यता ही ख़त्म कर देनी चाहिए
Saturday, February 7, 2009
Hindi Blog Tips: 'हिन्दी में लिखिए' विजेट और भी बेहतर
Hindi Blog Tips: 'हिन्दी में लिखिए' विजेट और भी बेहतर
Thursday, February 5, 2009
लोकतंत्र में संविधान,न्याय ,वकील और पुलिस ,
जब से भारत सरकार ने( सी आर पी सी )में गिरफ्तारी से सम्बंधित ,संविधान में महत्त्वपूर्ण संसोधन पास किया है की ७ साल या उससे कम की सजा के प्रावधान वाले केसेस में बिना न्यायालय की अनुमति के गिरफ्तारी ना की जाए तभी से देश भर के वकीलों ने हड़ताल और ना जाने क्या क्या करना शुरू कर दिया है यद्यपि संसोधन में सरकार का लक्ष्य व्यापक और सुधार को प्राथमिकता देना है ,और सरकार ये भी चाहती होगी की जो केसेस न्यायालयों में कितने ही सालो से लटके पड़े रहते हैं वो भी ख़त्म हों और उनकी संख्या सरकार के मुताबिक एक करोड़ पचास लाख है और उनको निपटाने के लिए लगभग दस हजार न्यायालयों की है ,इसमे वास्तविकता ये है की हमारे देश में न्यायिक प्रकिर्या बहुत -बहुत ही धीमी है उसका कारण भी वकील और पुलिस है ,इन दोनों के बीच में न्यायाधीश बेचारे फंसे रहते हैं क्योंकि उनको ये तय करना मुस्किल हो जाता है की अभियुक्त कौन है ,अक्सर ऐसा देखा जाता है की पुलिस अपनी इन्वेस्टिगेशन के आधार पर चींटी ना मरने वाले को किल्लर ,नपुंशक को रेपिस्ट ,मामूली चोर को बहुत बड़ा डकेत ,और सीधे साधे इमानदार इंसान को फ्रौड़ ,पुलिस से पंगा लेने वाले को आतंकवादियों का सरगना ,ना जाने कितने सीधे साधे लोग इनकी गिरफ्त में आकर पूरे जीवन जेलों में जिन्दगी काटते रहते हैं और उनपर ऐसी ऐसी धाराए ,वकीलों से सलाह लेकर लगा देते हैं की जीवन भर बेल मांगते रहे तो वो भी ना मिले हलाकि हमारे संविधान में सभी के हेतु बेल का प्रावधान है पर पैसों के अभाव में ना जाने कितने ही वर्षों से कितने ही शरीफ आदमी जेलों में जीवन यापन कर रहे है
क्योंकि छोटे न्यायालयों में ये वकील और पुलिस क्या क्या करते हैं उसको लिखने में भी शर्म आती है परन्तु उच्च न्यायालयों में तो बेल कराने वालों की इतनी मोटी फीस है की मध्यम दर्जे का व्यक्ति भी वो भर नहीं सकता ,छोटा मोटा वकील भी बेल के लिए २५ से ३० हजार रुपया एक पेशी का मांगता है और सीनियर वकील तो एक एक पेशी के लिए लाखों रूपये लेते हैं यदि कोई व्यक्ति किसी प्रकार वकील कर भी ले तो सामने वाले का वकील उलटी उलटी दलीले पेश करके जमानत होने ही नहीं देता और फ़िर या तो उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाए या फ़िर जेल जाए ,और उच्चतम न्यायालय के वकीलों की बेल कराने की फीस २ या ४ लाख से कम तो पर पेशी है नहीं ,यदि हाई कोर्ट में कोई गलती से भी एंटी सिपेट्री बेल लेने चला गया तो या तो सूखकर कांता हो जायेगा या आत्महत्या कर लेगा क्योंकि झूठे व्यक्ति का वकील उसकी बेल तो होने नहीं देगा चाहे उसे कितना ही झूट क्यों ना बोलना पड़े और झूटा व्यक्ति अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर सकता है क्योंकि उसे तो धन या प्रोपर्टी तभी मिलेगी जब तक वो पूरा दवाब बना कर चलेगा और शरीफ व्यक्ति की बेल नहीं होने देते और दस दस या १५ २० तक तारीखे पड़ती रहती है अक्सर ये देखा गया है की वकील और पुलिस मिलकर एक अच्छे से अच्छे न्यायाधीश को अपनी वाक् चातुर्यता से दिग्भ्रमित कर देते हैं की उनको एक सही फेसला लेने के लिए हजारों बार सोचना पड़ता है की कहीं कोई शरीफ व्यक्ति ना मारा जाय ,लगभग सभी जजों की यही इच्छा होती है क्योंकि वो तो अपना फेसला वकीलों की बहस के आधार पर ही करते हैं ,यदि शरीफ व्यक्ति का वकील कुछ कमजोर है तो भी वो तो गया बेचारा काम से ,इन सभी तर्कों को ध्यान में रखकर सविधान में ये संसोधन किया गया ,दूसरा कारण है कोर्ट को केशों की अधिकता से बचाना और पेंडिंग केशों को निपटा कर ,न्याय प्रकिर्या में सुधार और तवरित सेवा प्रदान करना ,पर वकीलों को ये इसलिए अच्छा नही लगता की जिन केशिस के कारण उनका घर चलता था और वो रात दिन अपनी जेबें भर रहे थे उन केसेस को साधारण घोषित कर दिया अब उनसे बेल की सेवाए लेने वाले कम हो जायेंगे उन्हें शरीफ आदमी मरे या जिंदा रहे इस बात से कोई मतलब नही हैं ,हमारे विचारों में तो न्यायालयों के जज मीडी एशन की प्रकिरिया को सख्ती से लागू करके दोनों पार्टियों की सीधी बात सुनकर फेसला करें तो ज्याद्द से ज्यादा केस सोल्व करने में सफलता मिलेगी और पेंडिंग केस भी यथा शीघ्र निपट जायेंगे हमारे विचार से तो सरकार ने संविधान में संसोधन करके बहुत ही अच्छा कार्य किया है ,वकीलों को तो आज नहीं तो कल अपनी हड़ताल समाप्त करनी ही पड़ेगी सरकार के इस ठोस कदम के बारें में आपकी क्या राय हैं क्रप्या लिखें
क्योंकि छोटे न्यायालयों में ये वकील और पुलिस क्या क्या करते हैं उसको लिखने में भी शर्म आती है परन्तु उच्च न्यायालयों में तो बेल कराने वालों की इतनी मोटी फीस है की मध्यम दर्जे का व्यक्ति भी वो भर नहीं सकता ,छोटा मोटा वकील भी बेल के लिए २५ से ३० हजार रुपया एक पेशी का मांगता है और सीनियर वकील तो एक एक पेशी के लिए लाखों रूपये लेते हैं यदि कोई व्यक्ति किसी प्रकार वकील कर भी ले तो सामने वाले का वकील उलटी उलटी दलीले पेश करके जमानत होने ही नहीं देता और फ़िर या तो उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाए या फ़िर जेल जाए ,और उच्चतम न्यायालय के वकीलों की बेल कराने की फीस २ या ४ लाख से कम तो पर पेशी है नहीं ,यदि हाई कोर्ट में कोई गलती से भी एंटी सिपेट्री बेल लेने चला गया तो या तो सूखकर कांता हो जायेगा या आत्महत्या कर लेगा क्योंकि झूठे व्यक्ति का वकील उसकी बेल तो होने नहीं देगा चाहे उसे कितना ही झूट क्यों ना बोलना पड़े और झूटा व्यक्ति अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर सकता है क्योंकि उसे तो धन या प्रोपर्टी तभी मिलेगी जब तक वो पूरा दवाब बना कर चलेगा और शरीफ व्यक्ति की बेल नहीं होने देते और दस दस या १५ २० तक तारीखे पड़ती रहती है अक्सर ये देखा गया है की वकील और पुलिस मिलकर एक अच्छे से अच्छे न्यायाधीश को अपनी वाक् चातुर्यता से दिग्भ्रमित कर देते हैं की उनको एक सही फेसला लेने के लिए हजारों बार सोचना पड़ता है की कहीं कोई शरीफ व्यक्ति ना मारा जाय ,लगभग सभी जजों की यही इच्छा होती है क्योंकि वो तो अपना फेसला वकीलों की बहस के आधार पर ही करते हैं ,यदि शरीफ व्यक्ति का वकील कुछ कमजोर है तो भी वो तो गया बेचारा काम से ,इन सभी तर्कों को ध्यान में रखकर सविधान में ये संसोधन किया गया ,दूसरा कारण है कोर्ट को केशों की अधिकता से बचाना और पेंडिंग केशों को निपटा कर ,न्याय प्रकिर्या में सुधार और तवरित सेवा प्रदान करना ,पर वकीलों को ये इसलिए अच्छा नही लगता की जिन केशिस के कारण उनका घर चलता था और वो रात दिन अपनी जेबें भर रहे थे उन केसेस को साधारण घोषित कर दिया अब उनसे बेल की सेवाए लेने वाले कम हो जायेंगे उन्हें शरीफ आदमी मरे या जिंदा रहे इस बात से कोई मतलब नही हैं ,हमारे विचारों में तो न्यायालयों के जज मीडी एशन की प्रकिरिया को सख्ती से लागू करके दोनों पार्टियों की सीधी बात सुनकर फेसला करें तो ज्याद्द से ज्यादा केस सोल्व करने में सफलता मिलेगी और पेंडिंग केस भी यथा शीघ्र निपट जायेंगे हमारे विचार से तो सरकार ने संविधान में संसोधन करके बहुत ही अच्छा कार्य किया है ,वकीलों को तो आज नहीं तो कल अपनी हड़ताल समाप्त करनी ही पड़ेगी सरकार के इस ठोस कदम के बारें में आपकी क्या राय हैं क्रप्या लिखें
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