Thursday, April 29, 2010
न्यायपालिका और जनता जनार्दन ,शासक और शासन
इतिहास गवाह है कि जिस देश में भी जिस शासक के शासन काल में वहाँ कि जनता का विश्वास उस देश कि न्याय पालिका से उठ गया क्योंकि वहां कि न्यायपालिका में दोष उत्त्पन्न हो गए थे चाहे तो वो शासक के कारण अथवा उसके कानूनी सलाहकारों अथवा क़ानून के कारिंदों के कारण ,या कारण कोई भी रहा हो ,उसी देश अथवा शासक का अंत हो गया अथवा वहां कि जनता ने उस देश का तख्ता पलट कर दिया ,और ऐसा मुस्लिम देशों में तो अक्सर होता ही रहता है इससे प्रतीत होता है कि वो लोग अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग हैं बामुकाबले हमारी देश कि जनता के ,क्योंकि जिस तरह क़ानून कि धज्जियां हमारे देश में उड़ाई जा रही हैं वैसी तो किसी देश में भी होती प्रतीत नहीं हो रही ,यद्यपि मोटे तोर प़र तो हमारे देश के दो उदाहरण सभी जानते हैं ,जब तक राजपूतों के शाशन में न्यायपालिका में दोष नहीं था तब तक उनका शासन चला और दोषयुक्त होने प़र जनता ने उसे उखाड़ दिया और फिर आ गया मुगलों का शासन ,जब तक मुगलों कि न्याय प्रणाली साफ सुथरी और जनता कि सुनती रही अथवा न्याय प्रणाली दोषी नहीं हुई तब तक मुग़ल शासन कि नीव भी नहीं हिली और जब ओरंगजेब के जमाने में न्याय पालिका में दोष उत्पन्न हो गए तो धीरे धीरे उसका भी अंत हो गया और उसके बाद आ गया अंग्रेजों का शासन ,जब तक वो जनता को सही न्याय देते रहे तब तक तो उनका शासन चला और जब उनकी न्याय पालिका में भी भाई भतीजावाद पैदा हो गया तो जनता एकजुट होकर उनके शासन को भी समाप्त करके ही दम लिया ,तो मेरा कहने का तात्पर्य है कि भारत देश में लोकतंत्र को बचाना है तो न्यायपालिका में सुधार करना होगा वरना आज जो हाल हमारे देश कि न्यायपालिका का है उससे तो दिन प्रितिदीन जनता का विश्वास उठता जा रहा है और जिस दिन वो विश्वास पूर्णत: ख़तम हो जाएगा उस दिन क्या होगा ये तो भगवान् ही जान सकता है और कोई नहीं .यद्यपि जनता अपने देश कि न्यायपालिका प़र आज भी विश्वास करती है प़र जनता ही न्याय ना मिलने के कारण या न्याय मांगने वाले को उलटा फंसाकर ,चारों और त्राहि त्राहि मची है यदि किसी को यकीन ना हो तो देश में सर्वे कराकर देख ले स्वत:ही ज्ञात हो जाएगा
Saturday, April 24, 2010
न्याय पालिका को भ्रष्टाचार से मुक्त करना होगा
आज सभी जानते हैं कि न्याय पालिका भ्रष्टाचार से कंठ तक डूबा है ,और पहली बात तो ये है कि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय से न्याय पाने कि गुहार लगाना भी किसी गरीब आदमी के बस कि बात नहीं है क्योंकि बिना वकीलों के वहाँ केस लड़े नहीं जाते और जिन केसों का सही फेसला करवाना हो तो उन केसेस के लिए सीनियर वकील रखे जाते हैं और उनकी फीस देना गरीब के बसकी बात नहीं ,इसलिए वो लोग नीचे के कोर्ट में ही हार कर बैठ जाते हैं ,और ऊपर जाने के नाम ही नहीं लेते ,उन सीनियर वकीलों से तो बात तक करने ,या केस समझाने के लिए ही छोटा वकील करना जरूरी है जिसकी फीस भी लाखों में होती है ,उसके बाद सीनियर वकील कि फीस जो प्रति तारीख के हिसाब से होती है ,और फिर भ्रष्टाचार कि रकम अलग से ,अब सोचिये इतना करने के लिए तो गरीब आदमी को अपना मकान दूकान के साथ बच्चे तक बेचने पद सकते हैं और फिर भी न्याय मिले या ना मिले ,तो इन सभी के लिए और लोकतंत्र कि रक्षा के लिए सरकार को कुछ कार्य तो करने ही पड़ेंगे
सबसे पहले तो न्याय मांगने वाले गरीब आदमी को सरकारी सीनियर और इमानदार वकील बहुत कम फीस प़र नियुक्त कराना चाहिए
उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के जजों कि नियुक्ति ,प्रशासनिक अधिकारियों कि भाँती डाइरेक्ट होनी चाहिए किसी भी वकील को प्रक्टिस के आधार प़र जज नहीं बनाना चाहिए ,असली बिमारी कि जड़ यहीं से है
किसी भी कोर्ट का जज अलग जोंन का होनाचाहिए जैसे कि नोर्थ में साउथ का और साउथ में नोर्थ का या एनी किसी जोंन का
किसी भी जज का बाई बंधू बेटा रिश्तेदार उस कोर्ट में प्रक्टिस नहीं करता हो ,ऐसा भी देखने में आया है कि जजों के रिश्तेदार आदि उच्च न्यायालय आदि में प्रक्टिस करते हैं और सभी तरह के जुगाड़ वो कर लेते हैं
सभी कोर्ट्स के अन्दर सी ,सी, टी वी, ,और रिकार्डिंग का पूर्ण प्रबंध होना चाहिए ,
सभी कोर्ट्स में वकालत करने कि मुख्य भाषा मात्र भाषा हिंदी या जो भी राज्य कि भाषा हो ,होनी चाहिए ताकि वकीलों और जज कि गुफ्तगू को सभी लोग और न्याय मांगने वाला भी समझ सके ,अक्सर कम पढ़ा लिखा वक्ती तो कोर्ट कि भाषा ही नहीं जान पाटा
हर व्यक्ति को अपना केस खुद लड़ने कि परमिसन मिलनी चाहिए ताकि वो अपनी परेशानी सही प्रकार से जज महोदय को समझा सके ,जिस तरह कि लोक अदालते फैसले करती हैं और सरकार ने भी एक मिदिएशन सेंटर स्थापित किये हैं जो काफी सफल हैं ,प़र वो अभी किरिमिनल केस में है इसी तरह सिविल कासीस में भी होना चाहिए
जजों को सरकार ने काफी पावर्स ,अधिकार दे रखे हैं प़र वो जो भी फैसले देते है वो सभी लक्जीर के फ़कीर के तरह ही होते है
झूठ और सच को परखने के लिए सभी कोर्ट्स में मौका मुआना करने के लिए कमिश्नर नियुक्त होने चाहिए क्योंकि बंद कमरे में बैठ कर न्याय करने में दिक्कते आती ही हैं झूठ और सत्य का सही फैसला नहीं हो पाटा
वकीलों और जजों के मिलने जुलने या पार्टी आदियों में वकीलों के द्वारा जजों को आमंत्रित करने प़र रोक होनी चाहिए ,होली दिवाली के प्रचलन से भी जजों को दूर रहने के निर्देश होने चाहिए
उच्च और उच्चतम न्यायालय के जजों को इतने भी अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए ताकि वो जज दिनाकरन जी कि भाँती का व्यवहार करने लगे यदि वो राष्ट्र पति के द्वारा नियुक्त हैं तो राष्ट्रपति को उनके हटाने के लिए भी सवतंत्रता होनी चाहिए ,वरना वो तो बेलगाम कि भाँती व्यवहार करेंगे ही
यदि कोई जज भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो उसकी नियुक्ति तुरंत समाप्त होनी चाहिए ,और ये अधिकार लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्षों को भी होने चाहिए क्योंकि लोकतंत्र कि रक्षा और सरकार को भर्ष्टाचार से मुक्त रखकर चलाने कि जिम्मेदारी भी प्रधानमन्त्री और सभी सांसदों कि होती है
जजों को अपनी आय व्यय का ब्यौरा हर वर्ष कोर्ट के साथ साथ संसद में भी पेश करना चाहिए ,ताकि जनता जान सके कि हमारे फैसले करने वाले कितने पारदर्शी हैं
जजों को प्रितिदीन के हिसाब से कुछकेसेस फिक्स कर देने चाहिए कम से का २ या ३ केसेस तो रोजाना करने ही चाहिए प़र हमारे यहाँ कोर्ट्स में शायद ही कोई जज प़र डे १ केस भी नहीं करता जिसके कारण केसेस का हर कोर्ट में अम्बार लगा है क्योंकि वो तारीख के अलावा कूच भी तो नहीं देते
जजों को निर्देश दिए जाने चाहिए कि वो वकीलों कि फेस वेल्यु के हिसाब से फैसले ना करके उनकी काबलियत और और पतिश्नर के दोकुमेंट्स और परिस्तिथियों और साक्षों के आधार प़र ही फैसले करे
जजों को ये भी बताया जाय और महसूस कराया जाए कि आप कोर्ट में भगवान् का सवरूप हैं सभी लोग आपको भगववान कि तरह मानकर आपके आदेशों का पालन करते हैं
जजों को चाहिए कि सिविल केसेस में ख़ास तोर प़र भूमि ,मकान ,दूकान आदि में बिना ओरिगिनल कागज़ देखे किसी को भी स्टे ऑर्डर ,या स्टेतस को ,ना दिया जाय ,क्योंकि आज देखा जा रहा है कि कोई भी बेईमान आदमी कोर्ट में जाकर बिना सच्चे कागजो के ,केवल फोटो कापी के बल प़र ही जुगाड़ करके स्टे ऑर्डर या स्टे तस को , ले आता है और शरीफ आदमी फंस जाता है तब तक के लिए वो मकान भूमि या दूकान किसी काम के नहीं रहते ,किरायेदार तक भी ऐसा ही करते हैं और २० से २५ वर्ष तक खिंच लेते है और बिना मतलब के कानूनी प्रकिर्या शुरू हो जाती है और फिर वो बेईमान आदमी तरह तरह से अधिक परेशान करता है
४ ,४ महीने कि बजाय थोड़ी जल्दी कि तारीखें दी जाए इतने समय में तो आदमी केस कि सारी कहानी ही भूल जाता है और अगली तारीख के लिए उसे फिर म्हणत करनी पड़ती है
सबसे पहले तो न्याय मांगने वाले गरीब आदमी को सरकारी सीनियर और इमानदार वकील बहुत कम फीस प़र नियुक्त कराना चाहिए
उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के जजों कि नियुक्ति ,प्रशासनिक अधिकारियों कि भाँती डाइरेक्ट होनी चाहिए किसी भी वकील को प्रक्टिस के आधार प़र जज नहीं बनाना चाहिए ,असली बिमारी कि जड़ यहीं से है
किसी भी कोर्ट का जज अलग जोंन का होनाचाहिए जैसे कि नोर्थ में साउथ का और साउथ में नोर्थ का या एनी किसी जोंन का
किसी भी जज का बाई बंधू बेटा रिश्तेदार उस कोर्ट में प्रक्टिस नहीं करता हो ,ऐसा भी देखने में आया है कि जजों के रिश्तेदार आदि उच्च न्यायालय आदि में प्रक्टिस करते हैं और सभी तरह के जुगाड़ वो कर लेते हैं
सभी कोर्ट्स के अन्दर सी ,सी, टी वी, ,और रिकार्डिंग का पूर्ण प्रबंध होना चाहिए ,
सभी कोर्ट्स में वकालत करने कि मुख्य भाषा मात्र भाषा हिंदी या जो भी राज्य कि भाषा हो ,होनी चाहिए ताकि वकीलों और जज कि गुफ्तगू को सभी लोग और न्याय मांगने वाला भी समझ सके ,अक्सर कम पढ़ा लिखा वक्ती तो कोर्ट कि भाषा ही नहीं जान पाटा
हर व्यक्ति को अपना केस खुद लड़ने कि परमिसन मिलनी चाहिए ताकि वो अपनी परेशानी सही प्रकार से जज महोदय को समझा सके ,जिस तरह कि लोक अदालते फैसले करती हैं और सरकार ने भी एक मिदिएशन सेंटर स्थापित किये हैं जो काफी सफल हैं ,प़र वो अभी किरिमिनल केस में है इसी तरह सिविल कासीस में भी होना चाहिए
जजों को सरकार ने काफी पावर्स ,अधिकार दे रखे हैं प़र वो जो भी फैसले देते है वो सभी लक्जीर के फ़कीर के तरह ही होते है
झूठ और सच को परखने के लिए सभी कोर्ट्स में मौका मुआना करने के लिए कमिश्नर नियुक्त होने चाहिए क्योंकि बंद कमरे में बैठ कर न्याय करने में दिक्कते आती ही हैं झूठ और सत्य का सही फैसला नहीं हो पाटा
वकीलों और जजों के मिलने जुलने या पार्टी आदियों में वकीलों के द्वारा जजों को आमंत्रित करने प़र रोक होनी चाहिए ,होली दिवाली के प्रचलन से भी जजों को दूर रहने के निर्देश होने चाहिए
उच्च और उच्चतम न्यायालय के जजों को इतने भी अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए ताकि वो जज दिनाकरन जी कि भाँती का व्यवहार करने लगे यदि वो राष्ट्र पति के द्वारा नियुक्त हैं तो राष्ट्रपति को उनके हटाने के लिए भी सवतंत्रता होनी चाहिए ,वरना वो तो बेलगाम कि भाँती व्यवहार करेंगे ही
यदि कोई जज भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो उसकी नियुक्ति तुरंत समाप्त होनी चाहिए ,और ये अधिकार लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्षों को भी होने चाहिए क्योंकि लोकतंत्र कि रक्षा और सरकार को भर्ष्टाचार से मुक्त रखकर चलाने कि जिम्मेदारी भी प्रधानमन्त्री और सभी सांसदों कि होती है
जजों को अपनी आय व्यय का ब्यौरा हर वर्ष कोर्ट के साथ साथ संसद में भी पेश करना चाहिए ,ताकि जनता जान सके कि हमारे फैसले करने वाले कितने पारदर्शी हैं
जजों को प्रितिदीन के हिसाब से कुछकेसेस फिक्स कर देने चाहिए कम से का २ या ३ केसेस तो रोजाना करने ही चाहिए प़र हमारे यहाँ कोर्ट्स में शायद ही कोई जज प़र डे १ केस भी नहीं करता जिसके कारण केसेस का हर कोर्ट में अम्बार लगा है क्योंकि वो तारीख के अलावा कूच भी तो नहीं देते
जजों को निर्देश दिए जाने चाहिए कि वो वकीलों कि फेस वेल्यु के हिसाब से फैसले ना करके उनकी काबलियत और और पतिश्नर के दोकुमेंट्स और परिस्तिथियों और साक्षों के आधार प़र ही फैसले करे
जजों को ये भी बताया जाय और महसूस कराया जाए कि आप कोर्ट में भगवान् का सवरूप हैं सभी लोग आपको भगववान कि तरह मानकर आपके आदेशों का पालन करते हैं
जजों को चाहिए कि सिविल केसेस में ख़ास तोर प़र भूमि ,मकान ,दूकान आदि में बिना ओरिगिनल कागज़ देखे किसी को भी स्टे ऑर्डर ,या स्टेतस को ,ना दिया जाय ,क्योंकि आज देखा जा रहा है कि कोई भी बेईमान आदमी कोर्ट में जाकर बिना सच्चे कागजो के ,केवल फोटो कापी के बल प़र ही जुगाड़ करके स्टे ऑर्डर या स्टे तस को , ले आता है और शरीफ आदमी फंस जाता है तब तक के लिए वो मकान भूमि या दूकान किसी काम के नहीं रहते ,किरायेदार तक भी ऐसा ही करते हैं और २० से २५ वर्ष तक खिंच लेते है और बिना मतलब के कानूनी प्रकिर्या शुरू हो जाती है और फिर वो बेईमान आदमी तरह तरह से अधिक परेशान करता है
४ ,४ महीने कि बजाय थोड़ी जल्दी कि तारीखें दी जाए इतने समय में तो आदमी केस कि सारी कहानी ही भूल जाता है और अगली तारीख के लिए उसे फिर म्हणत करनी पड़ती है
Sunday, April 18, 2010
नियति
न्यायालय में न्याय पाने
जो भी जाता है
न्याय मांगते मांगते
बूढा अश्व सम हो जाता है ,
आँखें भरिया जाती है
कान बहरा हो जाता है
दन्त विहीन मुख
हिप्पो कि भांति मुस्कुराता है ,
न्यायाधीश झूठे सच्चे
दोनों को देखता है
कौन सच्चा है कौन झूठा
समझ नहीं पाटा है,
इसी तरह चलता रहता है केस
बदलते रहते हैं परिवेश
जज फैसला देता है
देखकर वकीलों के फेस ,
फिर सच्चा आदमी घटमुंडा बन
लुटाकर सर्वस्व ,लौट आता है
सच्चाई उजागर नहीं होती
बेईमान जीत जाता है
जो भी जाता है
न्याय मांगते मांगते
बूढा अश्व सम हो जाता है ,
आँखें भरिया जाती है
कान बहरा हो जाता है
दन्त विहीन मुख
हिप्पो कि भांति मुस्कुराता है ,
न्यायाधीश झूठे सच्चे
दोनों को देखता है
कौन सच्चा है कौन झूठा
समझ नहीं पाटा है,
इसी तरह चलता रहता है केस
बदलते रहते हैं परिवेश
जज फैसला देता है
देखकर वकीलों के फेस ,
फिर सच्चा आदमी घटमुंडा बन
लुटाकर सर्वस्व ,लौट आता है
सच्चाई उजागर नहीं होती
बेईमान जीत जाता है
Saturday, April 10, 2010
लोकतंत्र के रक्षा कवच दिग्गज नेताओं के दृढ ब्यान
हमारे देश में जब भी बाहरी ताकतों ने हमले किये या आतंकवाद फैलाया ,तब तब हमारे देश के बड़े बड़े नेताओं या प्रधानमन्त्री जी अथवा गृह मंत्री ब्यान देते रहते हैं कि हम मुंह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार हैं जब से देश आजाद हुआ है तब से अब तक ये ही होता रहा है ,भारतीय जनता पार्टी के राज में एल के ,अडवानी जी का ये ब्यान कि हम मुंहतोड़ जवाब देने को तैयार है ,या २६ \११ के दौरान मंत्री श्री शिवराज पाटिल जी का ब्यान ,और अब चिदम्बरम जी का ब्यान ,और भी इससे पहले काफी ब्यान आते रहे होंगे .प़र केवल कहते ही रहते हैं करते तो कुछ भी नहीं चाहे तो चीन हमारी भूमि घेर ले अथवा कुछ भी कर ले या हमारी देश कि संसद प़र हमला कर दे अथवा मुंबई में कहर बरपा दे और कितने ही निरीह व्यक्तिओं को मौत के घात उतार दे या पुणे में कुछ भी काण्ड कर दे ,प़र हाँ एक बात जरूर है कि हमारे देश कि जनता है काफी समझदार ,वो कुछ नहीं बोलती वो तो देश में सब कुछ सहकर और नेताओं कि बात प़र विस्वास करके लोकतंत्र कि रक्षा करती रहती है ,हमारी प्रार्थना है कि उसको भी अपने कान और आँख खुले रखनी चाहिए तभी देश का भला हो सकता है
Wednesday, April 7, 2010
भारत के लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका
हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका की गरिमा में दिन प्रितिदीन कमी आती जा रही है है ,भ्रष्टाचार इतना बाद चुका है की देश के हर आदमी की जुबान प़र एक ही बात है कि मुकद्दमे बाजी से बाज आना क्योंकि वहाँ कोई भी काम बिना पैसे के नहीं होता ,पैसा दो और फैसले कराओ ,जो पैसा देगा उसी पक्ष में फैसला हो जाएगा ,बहुत से वकील लोग ऐसी ही दलाली का काम अधिक और केस कम लड़ते है ,वैसे तो ५० %का काम दलाली है प्रक्टिस तो उनको करनी आती नहीं ,हर साल किसी ना किसी बड़े जज कानाम भ्रष्टाचार में लिप्त होकर न्यूज़ पपर्स में ,टी,वी, में आ जाता है आज यदि धूम मची है तो वो हैं चीफ जस्टिस दिनाकरन जी जो कि कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस है ,अब आप खुद सोचिये कि जिस जज कि जिम्मेदारी सम्पूर्ण कर्नाटक हाई कोर्ट को चलाना है या निगाह रखनी है ,और वो ही आय से ज्यादा धन ,लैंड स्केम्म .गरीबों कि रोजी रोटी छीनने और उनकी खाली जमीनों को हथियाने ,और ना जाने कितने ही भर्ष्टाचार में लिप्त है तो देश के लोकतंत्र कि रक्षा कैसे करेगा और ऊपर से कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं अब उनकी कुर्सी भी छुडवाने के लिए शायद पार्लिआमेंट का ही सहारा लेना पड़े ,और यदि हम उनके चेहरे मोहरे को देखते हैं तो वो बड़ी बेशर्मी के साथ अकड में बैठे नजर आते हैं अत; सरकार को ऐसा क़ानून बनाना चाहिए कि हाई कोर्ट का कोई भी जज भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो उसे तुरंत ही कुर्सी से हटाया जाना चाहिए और उसकी सम्पूर्ण संपत्ति कुर्क कर लेनी चाहिए तुरंत ही ,ताकि दुसरे जज भी उससे कुछ सिक्षा ले सकें ,वैसे तो हमारे देश का भगवान् ही मालिक है,,कम से हर गरीब और मालदार आदमी को न्याय तो मिलना चाहिए प़र यदि इसी तरह के काण्ड होते रहे और ऐसे ही चलता तो शायद वो दिन दूर नहीं जब प्रत्येक भारत वासी का विश्वाश न्याय पालिका से उठ जाएगा ,
Tuesday, April 6, 2010
लोकतंत्र में नक्सलवाद आखिर क्यों ?
कल की लोमहर्षक घटना जिसमे की नक्सलवादियो के द्वारा ७५ सैनिकों की ह्त्या कर दी गई ,आखिर इन सैनिकों का क्या दोष था ये तो बेचारे देश और प्रदेशों की रक्षा ही कर रहे थे यदि नक्सलियों को कोई परेशानी सरकार से है तो इन निरीह सैनिकों की ह्त्या के बजाय उनको सरकार से बातचीत करनी चाहिए और आखिर वो चाहते क्या हैं और क्या उनकी समस्याए हैं उनको अपनी समस्याए सरकार को बताकर उनका हल तलाशना चाहिए ,वरना इस तरह तो शरीफ सिपाही बेचारे मारे जाते रहेंगे ,और सरकार को भी चाहिए की उनको जल्दी जल्दी बातचीत के घेरे में लाये ,और इया समस्या का समाधान करे ,रोजाना ये सब देखकर ह्रदय द्रवित होता है ज़रा सोचिये जो शहीद हो गए हैं उनकी पत्नी और बच्चों का क्या दोष है जो की उनके सिर से साया उठा लिया गया ,और जैसा की गृह मंत्री साहब बातचीत के लिए कह रहे हैं आमंत्रित कर रहे है तो नक्सलियोंम के नेताओं को भी नम्रता से सोचना चाहिए
Saturday, April 3, 2010
लोक तंत्र क़ा अंत जल्दी ही ,वरना व्यवस्था बदलो
आज के हालात और भ्रष्टाचार की चरम सीमा देखकर कोई भी आदमी आराम से कह सकता है की अब लोकतंत्र भारत में ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है क्योंकि लोकतंत्र क़ा मतलब होता है प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान व्यवस्था ,और आज वो भारत में नहीं है यद्यपि क़ानून बनते हैं प़र लागू नहीं हो पाते यदि लागू हो जाते हैं तो उनका पालन नहीं होता ,नेता अधिकारी ,पुलिश और न्यायालय, गरीब अमीर ,शिक्षित और अशिक्षित आदमी और महिला,लड़का और लड़की ,सभी में भेदभाव करते हैं क्यों नहीं सभी को समान रूप से देखा जा रहा क्यों ना सबको एक ही नजर से देखते इसका सबसे बड़ा मुख्य कारण है भ्रष्टाचार ,जो नेता को पैसे देवे उसका काम हो जाता है ,जो न्याय पाने के लिए पुलिश को पैसे देवे उसको जो चाहे लिख दिया जाता है जैसी भी रिपोर्ट चाहिए ,चाहे वो कोई भी ऍफ़ ,एल हो ,मिल जाती है इसमें एक चोर सीध सादे आदमी को क़ानून के चक्कर में फंसा देता है और मोटे मोटे नाम वाले जिनका चेहरा देखकर ही उच्च कोर्ट के जज उनके क्लाइंट के पक्ष में फैसले दे देते हैं ,आखिर क्या क्या उनके मुंह पे सुरखाब के प़र लगे हैं ,प़र क्या लगा है वो में भी जानता हूँ और आप भी जानते हो इंग्लिश में एक अच्छा सा सब्द है बार्टर सिस्टम यानी के सेट्टिंग जहां हो जाए भला वहाँ काम क्यों नहीं होगा ,आज इन तीनों जनों की वजह से लाखों अच्छे लोग ,इसी लोकतंत्र में जेलों में साद रहे हैं और चोर बेईमान कर्रप्ट जिन्दगी के मजे ले रहे हैं ,हमारे समाज में पैसे की वजह से किसी क़ा भीम कोई दिन ईमान बचा ही नहीं है और जब पकडे जाते हैं तो कहते हैं की हमको तो झूटा ही फंसा दिया है जहां ये सब कुछ हो रहा है वहाँ आखिर कब तक लोकतंत्र रहेगा ये तो इश्वर ही जाने
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