नेताजी के रक्त में बसे कीड़ों का अपना -अपना अनुभव ----------
पहला कीडा -------उवाच
यही वो खून है
जो कभी भावुक नहीं होता
अपनों को भी लूटने में
तनिक संकोच नहीं करता
दूसरा कीडा ------उवाच
इस खून में जो नशा है
वो शाराब में भी नहीं होता
भाँती -भाँती के खून पीकर
काकटेल से कम नहीं होता
तीसरा कीडा -----उवाच
इस खून को पीकर
मैंने कई बार अजमाया है
झूठ फरेबी ,धोखा धडी कर
अरबों रुपया कमाया है
Thursday, January 29, 2009
राजनीति
आरोप
प्रत्यारोप
भ्रष्टाचार
बलात्कार
हवाला काण्ड
तंदूर काण्ड
और उन पर लीपापोत
राजनीति के ये हैं छ;स्रोत
प्रत्यारोप
भ्रष्टाचार
बलात्कार
हवाला काण्ड
तंदूर काण्ड
और उन पर लीपापोत
राजनीति के ये हैं छ;स्रोत
आरक्षण--एकता --धातु मिश्रण--नेतागिरी--दल बदलू
आरक्षण ------आरक्षण की आग में
राजनीती के भाड़ में
जनता सारी जल रही
इन दोनों की राड़ में
एकता ------देश के कर्ण धार जानते हैं
एकता क्या और कैसे होती है
अपनी -अपनी तोड़ पार्टी
एकता की शुरुआत होती है
धातु मिश्रण -राजनीति में आदमी
आदमियों को गला रहा है
कोई स्वर्ण गला रहा है
कोई चांदी पिघला रहा है
कोई दोनों को ही ना गला
गिलिठ को चमका रहा है
तो कोई सभी का मिश्रण कर
नई धातु बना रहा है
राजनीती के भाड़ में
जनता सारी जल रही
इन दोनों की राड़ में
एकता ------देश के कर्ण धार जानते हैं
एकता क्या और कैसे होती है
अपनी -अपनी तोड़ पार्टी
एकता की शुरुआत होती है
धातु मिश्रण -राजनीति में आदमी
आदमियों को गला रहा है
कोई स्वर्ण गला रहा है
कोई चांदी पिघला रहा है
कोई दोनों को ही ना गला
गिलिठ को चमका रहा है
तो कोई सभी का मिश्रण कर
नई धातु बना रहा है
Wednesday, January 28, 2009
सत्यम कंप्यूटर घोटाला तो कुछ भी नहीं
आज के लोकतंत्र में सत्यम कंप्यूटर के मालिक राजू लिंगम ने जनता के विश्वास को तोडा उसका नुक्सान तो वो स्वयं उठा ही रहे है आज पुलिस उनको चोर उचक्कों की भांति खींचे फ़िर रही है और उस आदमी ने जितना बड़ा घोटाला किया उससे कहीं ज्यादा तो वो आय कर भी दे चुका होगा पर इतने बड़े आदमी के साथ ऐसा व्यवहार भी शोभाजनक तो नही है किउसे रात बिताने के लिए खाली फर्श पर ही सोना पड़े या उसके मनमुताबिक खाना भी ना मिले आख़िर ये सब देखकर भला कौन आदमी बड़ा बन्ने की कोशिश करेगा ,सभी जानते है की बिन आ हेराफेरी किए कोई भी आदमी इतनी तरक्की नहीं कर सकता ,और जो काम उसने किए जैसे की १३००० कर्मचारी फालतू दिखाकर उनके नाम पर हर माह २० करोड़ रुपया डकार जाना ,अथवा नकली आय विवरणी पेश करना ,बेंको से लोन लेने के लिए नकली या ज्यादा लाभ दिखाकर करोडो रूपये का लोन लेना ,अथवा आय कर बचाने के लिए और बहुत तरीके अपनाए होंगे ,ये सारे काम तो सभी बड़ी और चोटी कंपनियां आज से नही बरसों से करती आ रही हैं और सभी बैंक भी नकली बेलेंस सीटो के आधार पर कारपोरेट क्षेत्र की कम्पनियों को ही नही बल्कि छोटे छोटे व्यापारियों और फेक्टरी वालो को भी सी, सी लिमिट या ओ डी लिमिट देती आ रही हैं ,इस प्रोसीजर को कौन से बैंक के अधिकारी नहीं जानते वो तो ख़ुद ही तरीके बता देते हैं और उसके बदले में लेते हैं एक मुस्त मोटी रकम और जो आदमी बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर नहीं चलता या उनका कहा नहीं मानता उसका वो दिवाला निकलवा देते हैं इसलिए ये सब कार्य तो बैंक अदिकारी ,सी ऐ ,और मालिक मिलजुलकर करते हैं जब इन तीनो का किसी बात को लेकर विवाद हो जाता है तो फ़िर राजुलिंगम जैसा हाल होता है अब जो पकडा गया सो चोर ,अब मारी जाती है बेचारी जनता ,मेरे विचारों के मुताबिक सभी छोटी बड़ी,और कारपोरेट क्षेत्र की कम्पनियों की बेलेंस सीटो ,बैंक लोनों ,इनकम और खर्चो और कर्मचारियों ,कस्टम ,एक्साइज और बिल्डिंग और लैण्ड और शेयर की सेल पर्चेस की स्क्रूटिनी की जाए तो शायद एक भी बड़ी से बड़ी या चोटी कम्पनी अथवा सरकारी और गेर सरकारी बैंक पूरी तरह लिप्त पाये जायेंगे ,और नतीजा निकलेगा देश की अर्थ व्यवस्था ख़राब हो जायेगी इस मंदी के दौर में सभी कंपनियां कुछ ना कुछ करके अपने आप को जिन्दा भी रख रही है और जनता का भरोसा भी जीत रही है इस लिए अगर मंदी के दौर में नही छेदा जाय तो ज्यादा अच्छा हे ,वैसे भी यहाँ एक बात और मैं बता दूँ की जो आदमी कम्पनी को खड़ी करता हे उस कम्पनी को दिवाले की हालत में भी वो ही आदमी चला सकता हे ,अब चाहे सरकार कितने ही चेयरमैन बना दे और चाहे कितने ही डाइरेक्टर बदल दे ,और कितनी ही रकम सहायता के रूप में दे देवे इस सत्यम कंप्यूटर को राजुलिंगम के सिवा कोई नही चला सकता ,यदि वास्तव में सरकार इस कम्पनी और जनता के पैसों अथवा कर्मचारियों की नोकरी को बचानी चाहती हे तो फ़िर से किसी तरह राजू लिंगम को हो लाया जाय और उनके साथ में किसी एनी को भी लगा देना चाहिए वो भीकम्पनी चलाने के गुर राजू जी से सीख ले
Monday, January 26, 2009
भारत का पर्व गणतंत्र दिवस २६.१,०९,सोमवार
आज हमारे देश का पर्व गणतंत्र दिवस समारोह दिल्ली में बड़ी धूम धाम से मनाया गया जिसमे लाखो लोगों ने हिस्सा लिया जिसमे काफ़ी संख्या में हमारे विदेशी अतिथि भी थे इस पर्व की मुख्य विशेषता थी हम्मरे देश की प्रथम राष्ट्रपति महिला प्रतिभा देवी सिंह पाटिल जिन्होंने बाखूबी अपना रोल अदा किया और सम्पूर्ण कार्य हलकी हलकी मुस्कान के साथ करती रही उनके चेहरे पर सोम्यता साफ़ झलक रही थी ,गणतंत्र दिवस वास्तव में लोकतंत्र का स्थापना दिवस है हम सभी देशवासियों को लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रण करना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए की कहीं इसका दुरूपयोग ना हो
Sunday, January 25, 2009
लोकतंत्र में डी ,डी ,ऐ (दागदार .दामन .अड्डा )का रोल
डी डी ऐ का नया नाम करण संस्कार जो मीडिया ने किया है वो ही वास्तविकता है ,डी डी ऐ के अधिकारियों का लोगो के साथ मिलकर जो घपला किया गया है ये तो लोकतंत्र में जनता के सामने मीडिया के कारण आ गया है परन्तु जो घपले वहां पर डी डी ऐ के दलालों और चमचों के साथ मिलकर किए जाते हैं उनकी भनक तो जनता को लगती ही नहीं उसको तो केवल भुक्त भोगी ही जानता है क्योंकि अगर वो मीडिया के पास जाता भी है तो उसकी कोई नहीं सुनता हालाकि मीडिया दावे तो बड़े बड़े करता है परन्तु हाथ केवल बड़े घोटालों में ही डालता है ,मेने भुक्तभोगी होने के नाते जो वहाँ देखा है और सहा है उसकी बानगी देखिये ,एक डी डी ऐ के दलाल और छुत्भेये नेता ने अपने भाई को ब्लैक मेल कर पैसा एंठने के लिए डी डी ऐ के अधिकारियो और कुछ डी डी ऐ अथोरिटी के साथ मिलकर २२ वर्ष पुराने करारनामे का हवाला देकर मात्र एक दरख्वास्त दे दी की वो भी इस प्रोपर्टी में हकदार है बस इसी के आधार पर तुरत फुरत में एक इन्फोर्मिन्न्ग लैटर मुझे भेजा गया गया ज्निसका जवाब में ९० पेपर का जवाब दे दिया गया जिसको देखने के बाद भी वहां के एक ऊच्च अधिकारी ने करोडो की प्रोपर्टी का हवाला दे कर लाखों रूपये की मांग कर दी हमारे मना करने पर उसने कहा की आप घर जाकर आराम से सो जाओ आपके कागज़ सब सही है हम कनवेंस डिड को कैंसल नहीं करेंगे
उसके कुछ समय बाद एक पत्र हमको मिला की आपकी डिड केंसिल कर दी गई है और वो भी पात्र भेजा केंसिल करने के २ महीने बाद ,उसके बाद हम डी डी ऐ के निचले स्तर के अधिकारी से लेकर ऊच्च अधिकारियो जिनमे कमिश्नर और चेयरमेन के पि एस तक से मिले ,उन्होंने डी डी ऐ के उप अध्यक्ष से तो उन लोगो ने मिलने ही नही दिया और इन लोगो से ऊपर है उनसे भी मिलजुल रहे है पर नतीजा डाक के तीन पात ही हैं
ईन अधिकारियों ने हमको नाही तो सूना ना ही कोई शो कौस नोटिस दिया और फ्री होल्ड कैंसिल कर दी जब की फांसी देने से पहले भी अभियुक्त से अन्तिम इच्छा पूछी जाती है पर इन्होने तो बिना पूछे ही फांसी दे दी और जब भी मिले तो ये कहते हैं की शिकायत करता को मना लो ,और शिकायत करता करोडो रुपयों की मांग करता है इससे सिद्ध होता है की डी डी ऐ के अधिकारियों की उसके साथ मिली भगत है तो आप देखिये आज के लोकतंत्र में डी डी ऐ का कितना अच्छा रोल है ,मैं जिस नतीजे पर पहुचा हूँ उसके आधार पर वास्तव में ५ या १० % अधिकारियों को छोड़कर सभी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं ,ऐसा प्रतीत होता है की दिल्ली में शायद ही इतना करप्ट डिपार्टमेंट कोई और हो डी डी ऐ के बहार आज भी दलालों की भीड़ जमा होती है और जो काम करान ऐ का वायदा करके पैसे की डिमांड करते हैं ,बिन पैसे दिए तो वहां काम हो ही नहीं सकता चाहे कोई भी एडिया रगड़ रगद के मर ही क्यों ना जाए
अंत में मैं कहूंगा की यदि सरकार वास्तव में जनता को मकान देना चाहती है तो डी डी ऐ को हटाकर कोई एनी व्यवस्था करे
उसके कुछ समय बाद एक पत्र हमको मिला की आपकी डिड केंसिल कर दी गई है और वो भी पात्र भेजा केंसिल करने के २ महीने बाद ,उसके बाद हम डी डी ऐ के निचले स्तर के अधिकारी से लेकर ऊच्च अधिकारियो जिनमे कमिश्नर और चेयरमेन के पि एस तक से मिले ,उन्होंने डी डी ऐ के उप अध्यक्ष से तो उन लोगो ने मिलने ही नही दिया और इन लोगो से ऊपर है उनसे भी मिलजुल रहे है पर नतीजा डाक के तीन पात ही हैं
ईन अधिकारियों ने हमको नाही तो सूना ना ही कोई शो कौस नोटिस दिया और फ्री होल्ड कैंसिल कर दी जब की फांसी देने से पहले भी अभियुक्त से अन्तिम इच्छा पूछी जाती है पर इन्होने तो बिना पूछे ही फांसी दे दी और जब भी मिले तो ये कहते हैं की शिकायत करता को मना लो ,और शिकायत करता करोडो रुपयों की मांग करता है इससे सिद्ध होता है की डी डी ऐ के अधिकारियों की उसके साथ मिली भगत है तो आप देखिये आज के लोकतंत्र में डी डी ऐ का कितना अच्छा रोल है ,मैं जिस नतीजे पर पहुचा हूँ उसके आधार पर वास्तव में ५ या १० % अधिकारियों को छोड़कर सभी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं ,ऐसा प्रतीत होता है की दिल्ली में शायद ही इतना करप्ट डिपार्टमेंट कोई और हो डी डी ऐ के बहार आज भी दलालों की भीड़ जमा होती है और जो काम करान ऐ का वायदा करके पैसे की डिमांड करते हैं ,बिन पैसे दिए तो वहां काम हो ही नहीं सकता चाहे कोई भी एडिया रगड़ रगद के मर ही क्यों ना जाए
अंत में मैं कहूंगा की यदि सरकार वास्तव में जनता को मकान देना चाहती है तो डी डी ऐ को हटाकर कोई एनी व्यवस्था करे
भारत में लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति
आज मेरे देश की लोकसभा में लगभग ५४० सांसद हैं जिनमे से ४०%यानी के लगभग २१६ सांसद ऐसे हैं जिनपर ५ से लेकर २५ तक क्रिमिनल केस दर्ज हैं अब आप ज़रा सोचिये की जिन सांसदों के ऊपर देश की सत्ता को चलाने की जिम्मेदारी है जब वो ही इतने क्रिमिनल केशों में फंसे है तो भला वो देश को संभालेंगे या अपने केशों को संभालेंगे यह एक सोचने का विषय है और अभी जल्दी ही अप्रैल में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं सो उनके लिए लगभग सभी पार्टियां ऐसे उम्मीदवारों की तलाश में जुट गए हैं ,धन्य हैं वो लोग जिनकी तलाश जोर शोर से शुरू हो गई हैं ,और एक हम हैं की कोई पूछता ही नहीं ,क्योंकि मुझमे वो गुण हैं ही नही अब हम करें भी क्या की हमारे जैसे लोगों की हमारे लोकतंत्र को जरुरत है ही नहीं
Saturday, January 24, 2009
लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था भी चरमरा गई सी लगती है
आज प्रत्येक हिन्दुस्तानी का विश्वास अपने देश की सभी व्यवस्थाओं से उठ चुका है उसके बावजूद भी न्याय व्यवस्था में उसका विश्वास दृढ है परन्तु पिछले कुछ समय से देखने और सुनने में भी आया है की निचले कोर्ट्स के कुछ न्यायाधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाये गए जिससे आम हिन्दुस्तानी को निराशा ही हुई है क्योंकि एक न्याय प्रणाली ही बची थी जहाँ से आम नागरिक न्य्याय पाने की उम्मीद रखता था आज उसे वो भी धूमिल होती नजर आ रही है आज कोई भी हिन्दुस्तानी निचले कोर्ट्स पर यानी के हाई कोर्ट से निचले न्यायालयों पर तो विश्वास ही नही करता जनता में आम कहावत प्रचलित है की ये सब तो सब्जी भाजी की दुकाने है अब यदि न्याय प्रणाली में भी भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जमा ली तो कोई भी आम आदमी जिसके पास पैसा नही है न्याय पा ही नही सकता और ऊपर के न्यायालयों में आम आदमी जा नही सकता क्योंकि वहां के वकीलों की फीस जो की एक एक पेशी की पचास हजार से लेकर पाँच पाँच लाख तक है वो आम हिन्दुस्तानी तो दे नही सकता और इसके बावजूद भी खरीद फरोक्त भी जारी है अब आप सोचिये भला आम आदमी कैसे न्याय पा सकता है ,पैसे वाला आदमी तो अपने पैसे के बल पर नए नए तरीके अपना कर सामने वाले को घुटने टेकने को मजबूर कर देता है या उसके घुटने ही तोड़ देता है वो रोता चिल्लाता रहता है पर उसकी कोई नही सुनता इसलिए वो कोई भी तरिका अपना कर aatmhatyaa कर लेता है और फ़िर police भी कोई ना कोई कहानी गडकर फाइल बंद कर देती है
Wednesday, January 14, 2009
भारत में लोकतंत्र या पैसा तंत्र, दोनों में किसका वर्चस्व
मेरे हिसाब से तो अपने देश में पैसा तंत्र अधिक प्रसिद्ध और प्रचलित भी है आज किसी भी कार्यालय में जाओ ,पैसे दो और काम कराओ यदि पैसे ना दो तो चक्कर लगाते जाओ
Tuesday, January 13, 2009
भारत के लोकतंत्र की बानगी
भारत के लोकतंत्र में क्या क्या होता है ? अपने विचार इस सम्बन्ध में इसी ब्लॉग में भेजने की क्रपा करें
(१) वर पक्ष ,वधु पक्ष से मुंह मांगा दहेज़ लेता है ,वर्ष दो वर्ष लड़की को घर में रखता है और फ़िर धक्के देकर घर से बाहर फेंक देता है ,और लड़की अपने घर चली जाती है ,मुकद्दमा दायर होता है ,फेसला होता है ,वर पक्ष वधु पक्ष को टूटी फूटी लड़की और टूटा फूटा सामान वापिस कर देता है ,परिणाम लड़के की शादी तो एक दो महीने में हो जाती है पर लड़की की शादी का रोना तो जीवन भर रहता है ,उसकी जिन्दगी बरबाद हो जाती है और जीवन भर मजे लेता है
(२) --
(१) वर पक्ष ,वधु पक्ष से मुंह मांगा दहेज़ लेता है ,वर्ष दो वर्ष लड़की को घर में रखता है और फ़िर धक्के देकर घर से बाहर फेंक देता है ,और लड़की अपने घर चली जाती है ,मुकद्दमा दायर होता है ,फेसला होता है ,वर पक्ष वधु पक्ष को टूटी फूटी लड़की और टूटा फूटा सामान वापिस कर देता है ,परिणाम लड़के की शादी तो एक दो महीने में हो जाती है पर लड़की की शादी का रोना तो जीवन भर रहता है ,उसकी जिन्दगी बरबाद हो जाती है और जीवन भर मजे लेता है
(२) --
Saturday, January 10, 2009
क्या ८६ वर्ष का बुजुर्ग देश का पी .एम् बनना चाहिए ?
मेरे विचारों में इस आयु में मनुष्य का शरीर ही कार्य करना बंद कर देता वो ठीक प्रकार से जब चल फ़िर ही नहीं सकता तो देश को चलाने के लिए बड़े -बड़े फेसले कैसे दे सकता है पर कहते हैं की जब आदमी लिपिक का कार्य करने में असमर्थ हो जाता है तो वो राजनीती करने में सक्षम कैसे हो सकता है ,मेरे विचारों में तो ६० वर्ष से ऊपर का व्यक्ति इतने उच्च पद पर बेठना ही नही चाहिए ,इअलिये हमें नही चाहिए इतनी आयु का प्रधानमंत्री
आप अपने विचार भी मेरे ब्लॉग में व्यक्त करे ,हमें इस मुद्दे पर आपकी राय चाहिए
आप अपने विचार भी मेरे ब्लॉग में व्यक्त करे ,हमें इस मुद्दे पर आपकी राय चाहिए
Tuesday, January 6, 2009
क्या भारत में लोकतंत्र पूर्णत; सफल है या नहीं ?
मेरे विचारों में तो यहाँ पर लोकतंत्र सफल नहीं रहा क्योकि की आम आदमी तो क्या शिक्षित व्यक्ति भी उसके सही अर्थ से अनभिग्य है प्रत्येक व्यक्ति उसका मतलब परिस्तिथियों के अनुसार लगाता है क्या आप मेरी राय से सहमत हैं या नही ,क्रप्या मेरे ब्लॉग में अपनी राय जाहिर करें
Sunday, January 4, 2009
संसद (पार्लियामेंट )
उसके दर्शनार्थ हेतु
निश्चित एवं
अनिश्चित समय तक
कुर्सी पाने हेतु
उनको अपना धन
धर्म ईमान
नैतिकता
सत्य एकता
बंधुत्व ,मित्रता
सर्वश्व का त्याग
पाखंद्दता एवं
नाटकीयता
का लबादा ओड़ना पड़ता है ,
क्षण भर सोचिये
जो अपना धन
धर्म और ईमान
नेतिकता ,एकता एवं
मित्रता एवं सर्वस्व को
स्वाहा करके
कुर्सी पायेगा
भला सब कुछ
पुन; पाने हेतु
क्या देश की अस्मत
एकता ,अखण्डता का
एवं संस्क्रती को
कभी बचा पायेगा
निश्चित एवं
अनिश्चित समय तक
कुर्सी पाने हेतु
उनको अपना धन
धर्म ईमान
नैतिकता
सत्य एकता
बंधुत्व ,मित्रता
सर्वश्व का त्याग
पाखंद्दता एवं
नाटकीयता
का लबादा ओड़ना पड़ता है ,
क्षण भर सोचिये
जो अपना धन
धर्म और ईमान
नेतिकता ,एकता एवं
मित्रता एवं सर्वस्व को
स्वाहा करके
कुर्सी पायेगा
भला सब कुछ
पुन; पाने हेतु
क्या देश की अस्मत
एकता ,अखण्डता का
एवं संस्क्रती को
कभी बचा पायेगा
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