Sunday, April 26, 2009

पी .एम् मनमोहन सिंह एवं के .एल .अडवानी पर भी जूता

आज अहमदाबाद में कांग्रेस की रैली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी पर एक सॉफ्ट इंजिनियर हितेश चोहन द्बारा जूता फेंका गया ,और अहमदाबाद में ही भारतीय जनता पार्टी की रैली में क्रिशन लाल अडवानी पर भी एक साधू जिसका नाम बजरंग था जूता फैंका गया ,यद्यपि यह एक बहुत ही बुरी बात है ,और हमारे संस्कारों से भी बहुत दूर की बात है इन घटनाओं की जितनी भर्त्सना की जाए थोडी ही है ,परन्तु सोचने का एक विषय ये भी है की आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है ,आख़िर आदमी अपना मानसिक संतुलन क्यों खोता जा रहा है और पगाल्पन की हद तक पहुंचकर बिना ये सोचे समझे की इसका परिणाम क्या होगा जूता चप्पल किसी भी छोटे या बड़े नेता के ऊपर फैंक देता है या मार देता है ,ये तो चुनाव का समय है इसलिए वाहवाही पाने के लिए ये सभी नेता मुआफ कर देते हैं पर यदि चुनाव ना हों और इन्होने वोट ना लेनी हो तो शायद उलटा भी टंगवा देंवें ||||

मेरे विचारों में तो आज मेरे भारत वर्ष का प्रत्येक नागरिक महंगाई ,भूख ,बेरोजगारी घरेलु समस्याओं ,पुलिश ,न्यायालयों देश की अर्थ वयवस्था ,देश के नेताओं की करनी और कथनी से इतने अधिक दुखी हैं की वो कुछ भी करने को आमादा हैं , जिसके लिए जूते ,चप्पल तो कोई मायना ही नहीं रखते ,|||

अत;मेरी तो देश के नेताओं ,न्यायाधीशों

Friday, April 24, 2009

चुनाव आयोग का फरमान (सम्पत्र्ती ब्यौरा देना जरुरी )

हमारे लोकतंत्र में एक अच्छी बात होनी शुरू हो गयी है की चुनाव में खड़े होने वाले प्रत्याशी को अपनी संपत्ति का एवं आय व्यय का बौरा देना जरूरी कर दिया गया है ,और लगभग सभी प्रत्याशी अपनी संपत्ति का ब्यौरा दे भी रहे हैं जिनमें काफ़ी लोग ऐसे हैं जो की करोड़पति ही नहीं बल्कि अरबपति भी हैं कितनी अच्छी बात है की भारत सरकार की सत्ता अब किन्ही ऐरे गिरे हाथों में नही बल्कि ऐसे हाथों में हैं जो की बहुत ही सक्षम हैं वो बात अलग है की इतनी बड़ी बड़ी रकमों के बावजूद भी ये नेता गली कूंचे या छोटे -छोटे ग्रामों में घूम -घूम कर ख़ुद को गरीब बताते फ़िर रहे हैं और चुनाव आयोग के तयसुदा रकम से ,कई गुना पैसा पानी की तरह चुनावों में बहा रहे हैं और वो बात भी अलग है कि जन चुनाव के अंत में खर्चा घोषित करेंगे तो वो केवल हजारों और लाखों में होगा ,
पर हमारी समझ में ये नहीं आ रहा कि कोई भी डिपार्टमेन्ट या सरकार अथवा आयकर विभाग ने क्या कभी इन्सबसे ये पूछा है कि भाई तुम सारे दिन तो खद्दर के कुरते पाजामा पहन कर कही धरना कहीं हड़ताल कही बैठकें करते फिरते रहते हो तो ये इतना सारा पैसा तुमने कहाँ से कमा लिया ,तो हमारी चुनाव अधिकारी से प्रार्थना है कि इनसे पिछले ५ वर्षों कि भी आयकर व्यय कर का लेखा जोखा भी मंगवा लें और उस सबको जितने भी प्र्य्ताशी है उन सबके विवरण को किसी न्यूज़ पेपर में पुब्लिश भी करा देन ताकि उनके क्षेत्र कि जनता को पता लगे कि उनके इलाके का विधायक अथवा सांसद कितना लोह पुरूष है और जनता के लिए क्या -क्या कर सकता है ,हो सकता है कि काफ़ी लोग पकड़ में आ जाएँ और देश को भी चुनावों का खर्चा निकल आए

Thursday, April 23, 2009

जूते और चप्पलों की बरसात शुरू

जब एक शिक्षित स्त्री ने जज पर चप्पल फेंकी गई थी तो मैंने आशंका व्यक्त की थी किकहीं ये प्रचलन ना बन जाए ,वास्तव में ये ही होना शुरू हो गया ,जनता अपना संतुलन खो चुकी है और संस्कारों को भूल चुकी है क्योंकि नेताओं ,सरकारी अफसरों ,पुलिश सहित ,और सम्पूर्ण न्यायपालिका के क्र्त्यों ,कामकाज करने में ढीलापन ,देरी ,भर्ष्टाचार के कारण अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है और इतनी परेशान हो चुकी है कि वो कुछ भी करने को तैयार हैं उसी का कारण है ये जूता तंत्र ,जो कि लोकतंत्र मैं काफ़ी लोकप्रिय हो चुका है अब देखिये पहले एक जूता श्री चिदम्बरम पर ,दूसरा एल के अडवानी पर और तीसरा जूता जिंदल पर और अब चौथा जूता जितन्द्र पर ,लगता है लोगो को अब आदत सी पड़ चुकीहै-aआगे देखिये होता है क्या ,यदि यही हाल रहा तो देश में बदमनी फ़ैल जायेगी ,इससे देश कि इज्जत खाक मई मिल जायेगी ,इसलिए हमको चाहिए कि हम ख़ुद ही जल्द से जल्द सुधर जाए ताकि भविष्य में कोई परेशानी न आए .मेरे अपने विचारों मैं तो ये सब कुछ बहुतही bहयंकर रूप ही धारण ना कर ले जिसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं और लोकतंत्र मैं कहीं जूता तंत्र हीशुरू ना हो जाए जिसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे ,अत;हम लोको को चाहिए कि हम लोग संयम बरतें ,बाकी भला करेंगे भगवान्

Friday, April 10, 2009

एक जूते का करिश्मा,लोकतंत्र में अद्भुत नजारा

पहले एक कहावत थी की एक तीर से दो शिकार परन्तु अब ये लोकोक्ति बदलनी पड़ेगी और कहा जायेगा की एक जूते से दो शिकार ,यानी के पहले तो श्रीमान जगदीश टाइटलर जी का ही टिकिट काटना था परन्तु अब तो श्रीमान सज्जनकुमार जी को भी टिकिट काटकर हाथ में थमा दिया ,आख़िर ऐसी क्या आफत आ गई थी कांग्रेस पार्टी को की चाँद मिनटों में ही जगदीश टाइटलर के साथ साथ सज्जन को भी कहा की जा भाई घर जा के बेठ,कहीं तुम दोनों के चक्कर में पार्टीको सिक्ख कौमीनिटी की वोटो से ही हाथ ना धोने पड़े ,वैसे माननीय सोनिया जी ने बहुत ही जल्दी और बहुत ही अच्छा कदम उठा लिया नहीं तो वास्तविकता यही थी की कहीं सातों सीटो की आस मानकर चलने वाली पार्टी एक या दो सीटों पर ही सिमट कर रही जाती ,यदि इसी प्रकार के निर्णय चुनावों से पहले ही ले लिए जाएँ तो कितना अच्छा और साफ़ सुथरा प्रशासन जनता को मिल जाता और जनता शायद कांग्रेस के ही गुन गाती रहती जैसे की दिल्ली विधान सभा चुनावों में भी देखने को मिला ,मेरे विचारों में यदि कोई भी सत्ताधारी पार्टी अपने समय में जनता को समझे और शीघ्र ही निर्णय लेकर उसके दुःख दर्दों को दूर करे तो शायद ही कोई दूसरी पार्टी अगले चुनावों में अपना प्रभुत्व जमा सके ,वैसे ग्रह मंत्री चिदंबरम साहब की भी जितनी तारीफ़ की जाए वो थोडी ही है चाहे ऐसा उन्होंने मजबूरी में ,या चुनावों की वजह से ही क्योँ ना किया हो और एक पत्रकार को माफ़ कर दिया वैसे तो पत्रकार महोदय भी शर्मशार हैं ,पर सत्ताधारी सरकारया आने वाली सरकारों को ऐसा कुछ अवश्य करना चाहिए की ऐसे जूता फैंकने की घटनाओं की पुन्रावार्त्ती ना हो ,इन सब से सभी को ,पूरे देश को ,और प्रत्येक समुदाय को सबक लेना चाहिए क्योँ की इससे हमारे देश की दूसरे देशो में भर्त्सना की जाती है जिसके कारण हमारा सिर शर्म से झुक सकता है ,वैसे ये भी लोकतंत्र में एक अद्भुत नजारा है इससे ज्ञात होता है की वास्तव में भारत में एक शसक्त लोकतंत्र है जो अपना कार्य सुचारू रूप से कर रहा है ,,

Wednesday, April 8, 2009

लोकतंत्र की रक्षा करनी है तो

८० से ८३ ,८५ ,या ९० वर्ष की आयु ,कानो से भली प्रकार सुनाई ना देना ,याददास्त का कमजोर हो जाना ,गले से आवाज का ना निकलना ,नाक से स्वांस लेने में परेशानी ,आंखों पर ३० नंबर का चश्मा चढ़ा हुआ ,हर्दय की बाई पास सर्जरी ,एक किडनी ख़राब ,गैस प्रोब्लम ,घुटनों सहित शरीर के सभी जोडो में दर्द ,चलने फिरने में परेशानी या फ़िर वील चेयर का इस्तेमाल क्या इतनी सारी बिमारियों को सांसद बन्ने के लिए टिकिट दे देना और कहना की अब तुम क्षेत्र में जाकर काम करो क्या ये बीमारियाँ क्षेत्र की जनता की कोई सहायता कर सकती हैं ,जो स्वयम के शरीर को खींच नहीं सकती वो भला क्या तो जनता का भला करेंगी और क्या लोकतंत्र को बचाने में कामयाब हो सकेंगी ,आज के चुनावों में ही नहीं बल्कि पहले भी हमारे देश की सभी पार्टियां इन बिमारियों को सांसद ,विधायक या अन्य जनसेवकों का टिकिट देकर चुनाव लडाती रहीं है है ,और अक्सर देखा गया है की इनमे से कुछ तो अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाते और बीच में ही भगवान् जी को प्यारे हो जाते हैं जिससे देश में एक दिन के कार्य का हर्जाना भी होता है ,और कुछ सांसद बनते ही अमेरिका ,इंग्लॅण्ड अपना इलाज कराने भाग जाते हैं जिसमे की गरीबों की खून पसीने की कमाई काफ़ी पैसा इनके इलाज पर बरबाद होता है और ये मजे से अपने शरीर के बेकार अंग बदलवाकर वापिस आ जाते है और यदि कोई पत्रकार इनके बारे में पूछ ले तो कहते हैं की इनके पास जीवन भर का तजुर्बा है ,अब तजुर्बा क्या करेगा जब शरीर ही स्वस्थ नही है ,और सब जानते हैं की स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग रहता है ,तो भाई हमारी देश की सभी पार्टियों से करबद्ध प्रार्थना है की वो यदि वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं तो भविष्य में युवा और अधेढ़ प्रत्यासियों को ही टिकिट दे तभी लोकतंत्र बच पायेगा ,क्यों की देश को चलाने की जिम्मेदारी इन्हीं के सिरों पर है ,क्या १३० करोड़ की आबादी में ५४५ सांसद नही मिलेंगे

Tuesday, April 7, 2009

भारत के लोकतंत्र में चप्पल के बाद जूता भी

अभी कुछ समय पहले एक न्यायाधीश पर एक शिक्षिका के द्बारा चप्पल फेंके जाने की घटना और आज गृहमंत्री श्री चिदम्बरम जी पर एक पत्रकार द्वारा जूता फेंका जाना वैसे तो हमारे देश के लिए बड़ी शर्म महसूस करने वाली बात है परन्तु सवाल ये उठता है कि कि ऐसी क्या परिस्थिति थी कि एक समझदार पत्रकार को ऐसा कदम उठाना पडा कि वो अपने संस्कारों तक को भूल गया ,और ऐसा तभी होता है जब कोई बात मानव के अंतर्मन को अन्दर तक बींध जाती है ,ऐसा ही शायद पत्रकार के साथ हुआ कि मंत्री जी कि कोई बात उसे पसंद नहीं आई या मंत्री जी कि बात ने उसे विशेष पीडा पहुंचाई जिसके कारण वो स्वयम पर अंकुश ना लगा सका ,चलो आज तो मत्री जी ने चुनावी माहोल को खराब ना करने या एक कोम्युनिटी के वोट पाने हेतु ,पत्रकार को माफ़ कर दिया परन्तु सोचने का विषय है कि यदि चुनाव सिर पर ना होते तो क्या पत्रकार महोदय को मंत्री जी माफ़ कर देते मेरे विचार से तो कदापि नहीं ,दरअसल ये घटना महज इस वजह से हुई कि आज राजनीति केवल सरकारी दफ्तरों तक ही नहीं बल्कि उसने धीरे धीरे न्याय प्रकिर्या को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है तभी तो बड़े से बड़े केसेस में भी बड़े बड़े नेता साफ़ छुट जाते हैं किसी पर कोई ठोस मुकदमा ही नहीं बनता और वो साफ़ छूट जाता है शायद ऐसी ही सोच पत्रकार कि रही होगी टाइटलर जी के बारे में ,इस लिए उसने वो काण्ड कर दिया ,पर हमारा कहने का तात्पर्य है कि ऐसा कब तक चलेगा ,सरकार देश वासियों कि भावनाओं से कब तक खेलती रहेंगी ,क्या जब तक कि सम्पूर्ण जनता ऐसे कदम उठाने के लिए बाध्य ना होगी ,उसका भी क्या फायदा जब पानी सिर से ही उतर जाए ,तो लोकतंत्र को बचाने के लिए सरकार को ऐसी घटनाओं से सबक सीखना चाहिए और यदि सरकार ने जल्दी ही सबक ना लिया तो देश के लिए ये जूते चप्पलों कि बरसात नयी मुसीबते कड़ी हो जायेंगी वेसे भी आज देश का प्रत्येक नागरिक न्याय व्यवस्था और न्यायाधीशों के द्वारा फैसलों में देरी पर देरी तारीख पर तारीख ,और एक मुकदमा पड़ते ही दस और मुकद्दमे फैसलों के कारण पद जाने और बिना सोचे समझे ,मुकद्दमे कोर्ट में डलवा लेने के कारण आम आदमी तो दुखी है परन्तु पैसे वाले लोग या नेता ,अथवा क्रिमिनल प्रक्रति के लोग ,और वकील तो पूरी तरह खुश हैं क्योंकि ये तो हर शरीफ आदमी को कोर्ट में लटका कर रखके प्रेस्सर बना कर रखना चाहते हैं ताकि जैसा वोचाहे वैसा होता रहे ,शायद ये जूते चापल सरकार और न्याय प्रकिर्या को अपना विरोध इसी प्रकार पर्दर्शित करना चाहते हैं