Friday, July 30, 2010

पुलिश का रिमांड ,

पुलिश जब भी किसी बड़े आदमी ,या नेता ,अथवा कोई बड़ा व्यापारी ,अथवा मंत्री या भगवा कपडे वाले या अति सम्मान्जन्कीय ,जैसे कि धार्मिक नेताओं या समाजसेवियों का किसी भी कारणवश रिमांड आदि लेती है और उनको ज्यादा से ज्यादा दिन अन्दर रखकर लटकाना चाहती मही तो आये दिन एक ही बात कहती है कि वो पुलिश के साथ सहयोग नहीं कर रहे ,कहने का तात्पर्य है किया तो जो पुलिश कहलवाना चाहती है वो लिखकर उन्हें दे दें और अपने गले में घंटी बाँध लें चाहे वो दोषी हैं अथवा नहीं ,तब तो ठीक है यदि ना कर दी तो वो पुलिश को सहयोग नहीं कर रहे और ऐसा कह कह कर उसे जेल में लटकाए रखते हैं ,क्योंकि थर्ड डिग्री आजकल वैसे भी लागू नहीं है प़र मोके बेमोके गरीब सरिब प़र तो अपना ही लेते हैं ,प़र ये सब तो ठहरे जनता के ठेकेदार ,तो भला क्या करें अत; ऐसा करके ही अपनी नाराजगी जाहिर करते है ,प़र ऐसा करना लोकतंत्र के लिए हानिकारक है ,थोड़ी बहुत तो पुलिश में भी नेकनीयती होनी चाहिए ,आखिर हैं तो वो भी हमारे जैसे ही बासिन्दे ,
" सत्य मेव जयते "

Wednesday, July 28, 2010

आखिर जुडिसियल कस्टडी क्यों ?

अक्सर देखने में आया है कि क्रिमिनल केसेस में ,चाहे वो चोरी डकेती बदमाशी ,रेप ,चार सौ बीसी ,लूट ,मर्डर ,लड़ाई झगडा ,घरेलु झगडा ,कहने का तात्पर्य है कि चाहे केस कैसा ही भी हो ,और पुलिश किसी भी आदमी को पकड़ कर कोर्ट में पेश करती है ,और पुलिश खुद अपनी कस्टडी नहीं मांगती ,परन्तु जुडीसिय्ल कस्टडी में भेजने के लिए डिस्क्लोजर रिपोर्ट में अभियुक्त को भेजने हेतु रिक्वेस्ट करती है ,जिसका कम से कम समय १४ दिन का होता है ,
वकीलों कि काफी जिरह सुनने के बाद भी १ बार तो जो अभियुक्त है ,चाहे उसको पुलिश ने झूठा केस बनाकर ही फंसाया हो ,तब भी ,मजिस्ट्रेट या जज उसको जुडिसियल कस्टडी के अंतर्गत जेल में तो भेज ही देते हैं ,वो बात अलग है कि चाहे अगले दिन ही अभियुक्त अपनी बेल के लिए एप्लीकेशन लगा सकता है ,अब विषय ये है कि -----------
क्या अभियुक्त को कम से कम १ बार १४ दिन या बेल होने तक जेल में भेजना जरूरी होता है ,ऐसा कोई नियम या धारा है ?
यदी पुलिश को अभियुक्त से पूछताछ करनी होती तो वो उसको पुलिश ,अपनी कस्टडी में मांगती ,और जब उसने पूछताछ करनी ही नहीं तो
फिर जुडिसियल कस्टडी ही क्यों ?
क्या ये कोई पुलिश या कार्यपालिका का कोई रूटीन पालिसी है कि भाई एक बार तो जेल कि हवा खानी ही पड़ेगी ,अगर ऐसा है तो क्यों ?
क्या ऐसा करके लोकतंत्र में एक मानव के मूल अधिकारों का हनन नहीं ?
हमने जुडिसियल कस्टडी के बारे में अनेको वकीलों से पूछा परन्तु किसी ने भी माकूल जवाब नहीं दिया ,क्या वकील भी इससे अनभिग्य
क्या चार्जशीट दाखिल करने के बाद भी पुलिश ,अभियुक्त से पूछताछ कर सकती ,या ये अधिकार केवल सी ,बी ,आई को ही है ?
बिना वजह किसी भी अभियुक्त को जेल भेजने से सरकार को कुछ नुक्सान भी होते हैं जैसे कि --------
एक दिन जेल में रहने का खर्चा २३७ रुपया प्रितिदीन का आता है ,
जेल में एंट्री के समय में वहाँ के अधिकारियों को काफी दोकुमेंट तैयार करने पड़ते है ;
उसके रहने कि व्यवस्था भी अलग से करनी पड़ती है
उसी रात को उसके खाने पीने का अलग से एरेंजमेंट करना होता है ,
सिकयुरिटी कि व्यवस्था अलग से ,और भी बहुत कुछ करना पड़ता होगा ,
जेलों में वैसे भी कैदियों को रखने तक के लिए जगह नहीं हैं ,अकेले तिहाड़ जेल में ही ७००० कि व्यवस्था है और कैदी हैं लगभग १२००० ,इसका मुख्य कारण है कि जेल से निकलते कम हैं और पहुँचते है ज्यादा ,आखिर ऐसा कब तक चलेगा ,आखिर एक दिन लोगो को अनावश्यक जेल भेजने प़र रोक तो लगानी ही पड़ेगी ,
इसमें सबसे ज्यादा मोनेटरी लास सरकार को होता है ,
और यदि किसी शरीफ और इमानदार आदमी को जेल भेज दिया जाता है तो अराजकता बढती है जो कि लोकतंत्र के हित में नहीं है ,
और एक कहावत है कि जो एक बार जेल पहुँच जाता है तो वहाँ से कुछ सीखकर ही आता है ,जब वो वहाँ गुंडे ,मवाली ,बदमाशों ,रेकेतों से मिलेगा तो वही सीखेगा और वापिस आकर जनता में बद्मिनी ही फैलाएगा ,वो शरीफ और शरीफ नहीं बल्कि बदमाशों का भी बाप ही बनकर जेल से निकलेगा ,तो समाज में गंदगी ही फैलाएगा
क्रप्या जो बी ही मेरे ब्लोगर को देखें ,मेरी शंका का समाधान अवश्य करें

न्यायपालिका के विस्तार का १ और चरण,साकेत जिला कोर्ट

सरकार ने न्यायपालिका का विस्तार करने और जस्टिस एट doar पहुचाने के लिए इक और जिला कोर्ट का शुभारम्भ पहली अगस्त से साकेत में हो जाएगा ,जिसमे कोर्ट्स कि संख्या लगभग ८० होगी ,इसके कारण अब उस क्षेत्र के लोगों को न्याय मांगने के लिए पटियाला कोर्ट नहीं जाना पडेगा ,दिल्ली कि जनता कि समस्याओं का समाधान अब उनके घरों के नजदीक हो जाएगा ,सरकार ने अब तक जनता कि सुविधा को ध्यान में रखकर ६ जिला कोर्ट स्थापित कर दिए हैं ,यद्द्य्पी जिस हिसाब से कोर्ट बनते जा रहे हैं उसी हिसाब से मुकद्दमे भी बढ़ते जा रहे हैं ,परन्तु जनता को न्याय भी माकूल तरीके से नहीं मिल पा रहा ,तो देखना ये है कि आखिर मुकद्दमे कम क्यों नहीं हो रहे ,१ कोर्ट के ६ कोर्ट बन्ने के बाद भी
मेरे विचारों में सरकार के प्रयत्न मील का पत्थर हैं फिर भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा ,हालाकि जब कोर्ट बन रहे हैं तो जज भी बढ़ रहे हैं ,प़र मुकद्दमों कि तादाद उस हिसाब से ज्यादा बढ़ रही है इसका कोई तो कारण होगा मेरे विचारों में इसके कुछ मुख्य कारण हैं
१ ----कुछ तो जिस हिसाब से जनता बढ़ रही है उसके हिसाब से मुकद्दमे भी बढ़ रहे हैं
२ ----मुकद्दमों को निपटाने का वो ही पुराना ढर्रा आओ जो ,तारीख लो ,और घर जाओ जी ,
३ ----वकीलों का जजों को उलटी सीढ़ी बातों से दिग्भ्रमित करना ,यानी के आले बाले गाना ,
४ ----पूरी तरह मुद्दों से हटकर वकालत करना ,और अदालत का वक्त ब्बर्बाद करना ,
५ ----अदालतों द्वारा बिना सोचे समझे मुकद्दमों को एडमिट कर लेना ,
६ ----जजों के द्वारा केवल वकीलों को सुनकर ही फैसले देना ,
---जजों के द्वारा केस डालने वाले और विरोधी पक्ष से डाइरेक्ट सवाल जवाब ना करना ,जैसे अक्सर मिडीएशन ,और लोक अदालतों में होता
---किसी भी मुकद्दमे के फैसले में अपनी दिस्क्रिशन पावर का इस्तेमाल ना करना ,और नेक्स्ट कोर्ट के लिए छोड़ देना ,
---और भी अभी बहुत से कारण हो सकते हैं जो कि क़ानून के निर्माताओं ,विश्लेषण कर्ताओं ,कानूनविदों कि नज़रों में होंगे ,

Tuesday, July 27, 2010

सुप्रीम कोर्ट ने कहा,प्रापर्टी विवाद सुलझाना,हाई कोर्ट का काम नहीं,|

हाई कोर्ट से मुकद्दमों की संख्या कम करने हेतु और जनता कि सुविधा के लिए ,और लोकतंत्र के हित में एक और सन्देश सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिया और कहा कि ,हाई कोर्ट किरायेदारों को निकालने या प्रापर्टी विवाद जैसे सिविल मामलों में दखल नहीं दे सकता ,ऐसे मामलों को देखने का काम सिविल अदालतों का है ,
अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट को आर्टिकल २२६ के तहत रिट प़र जो सुनवाई का अधिकार मिला है उअमे वह नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को लागू करने का काम कर सकता है प़र नागरिकों के निजी विवादों को निबटाने में इनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता ,कुछ मामलों में रूटीन तरीके से हाई कोर्ट धारा २२७ के तहत ऐसे मामलों कि पिटीशन प़र सुनवाई करते हैं ,ऐसे में इन पितिषणों को रिट पिटीशन कि तरह लिया जाता है ,जस्टिस जी .एस .सिंघवी ,और ऐ .के ,गांगुली कि बैंच ने यह फैसला एक किरायेदार शालिनी श्याम शेट्टी के केश में सुनाया
ई मेल करें ,टाइम बचाएं :सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को आफिसियल कामकाज में ईमेल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने को कहा है ताकि लम्बे समय से लटकी पिटीशानों प़र तुरंत सुनवाई हो खासकर कमर्शल मामलों में ,कोर्ट ने कहा कि ५०%मामले सिर्फ इसलिए पेंडिंग है कि अरजिया और दस्तावेज कि रजिस्ट्रियां केश लड़ रहे पक्षों को समय प़र नहीं पहुँच पातीं ,चीफ जस्टिस एस ,एह ,कपाडिया कि बेंच ने कहा कि पिटीशन ,एफिडेविट ,और दुसरे कागजात दाखिल करते वक्त वकील ई मेल का प्रयोग करें ,

Saturday, July 24, 2010

डिस्क्लोजर रिपोर्ट कि कापी अभियुक्त को क्यों नहीं दी जाती ?

किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के बाद पुलिश एक डिस्क्लोजर रिपोर्ट कोर्ट में एम् एम् ,या जज के सामने पेश करता है ,उक्त व्यक्ति को गिरफ्तार करने का ब्योरा और कारण एवं धाराए लगी होती है ,जिसके बारे में सभी जानते है कि एक आई ,ओ ,उस रिपोर्ट को पैसे का वजन देखकर बनाता है ,उसमे वो महाशारिफ या जिसने कभी जीवन में क्राइम भी नहीं किया ,जिसका दूर दूर तक गलत लोगो या क्रिमिनलस से कोई ताल्लुक भी नहीं होता ,उस आदमी को भी एक क्रिमिनल के कहने भर मात्र से पैसे खाकर ,बिना कोई जांच पड़ताल के बहुत बड़ा क्रिमिनल बना देता है ,वो ये भिऊ देखने कि कोशिश नहीं करता कि उसका समाज में क्या सम्मान है अथवा बिजनेस में क्या गुड विल है ,या जिस प्रापर्टी के लिए उसको अभियुक्त बनवा रहा है वो उसी किप्रापर्टी है ,इसमें सबसे बड़ा कारण होता है कि वो उसको पैसे नहीं देता ,मेरे हिसाब से तो दिल्ली में ज्यादातर रिपोर्ट ऐसे ही तैयार होती हैं ,तो ये रिपोर्ट पुलिश वाला कोर्ट में तो जमा करता है प़र उसकी कापी उस व्यक्ति को नहीं दी जाती ,ये कौन सा नियम है जब कि सिविल कोर्ट में प्रत्येक कागज़ कि कापी सामने वाले यानी के दूसरी पार्टी को दी जाती है जिसको देखकर वो अपना जवाब पेश करता है
जब अभ्बियुक्त को डिस्क्लोजर रिपोर्ट कि कापी ही नहीं मिली तो फिर वो या उसका वकील उसके बचाव में क्या कहेगा ,वो तो केवल हवा में ही तीर चलाएगा ,क्योंकि वो नहीं जानता कि आई .ओ ने उसके बारे में क्या क्या लिखा है ,इसका नतीजा होगा कि एक शरीफ आदमी को एम् ,एम् ,या जज जमानत ही नहीं देगा और जबरदस्ती उस आदमी को जेल में ठूंस दिया जाएगा ,इसका मतलब है कि हर आदमी को जेल कि हवा तो खानी ही पड़ेगी ,ये कहाँ का न्याय है क्या ये मानव के मूल अधिकारों का उलन्घ्घन नहीं है में तो इसको सरासर अन्याय ही कहूंगा
अंत में मेरी सरकार और न्याय पालिका से यही गुहार है कि डिस्क्लोजर रिपोर्ट कि १ कापी बेल लेने के लिए अभियुक्त को भी दी जाय ताकि उसको न्याय मिल सके ,और जो धाराएं उस प़र लगाईं गई है उसकी भी व्याख्या आई ,ओ से करानी चाहिए कि क्या वो धाराएं अभियोक्त प़र एप्लीकेबल भी हैं या नहीं,या किसी शरीफ आदमी को पुलिश फंसा ही तो नहीं रही ,क्योंकि पुलिश चाहे कहीं कि भी हो उसके बारे में जनता सबकुछ अच्छी तरह जानती है
मेरे विचारों में शायद ये ही लोकतंत्र और लोक हित में होगा, जिससे कि लोकतंत्र और मानव अधिकारों कि भी रक्षा हो सकेगी ,और न्याय पालिका को भी फैसले देने में आसानी होगी ,और अभियुक्त को बेल लेने में आसानी होगी और जब बेल मिल जायेगी तो जेलों कि कमीभी नहीं पड़ेगी

Friday, July 23, 2010

निरर्थक अर्जी दी तो,कोर्ट लगाएगा हर्जाना,लोकतंत्र के हित में

कालकि अर्जियों se तारीख २२ जुलाई २०१० को दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऑर्डर पास किया जो कि लोकतंत्र के हित में तो है ही साथ में कोर्ट्स में बिना मतलब के केसेस से मुक्ति मिलेगी और कोर्ट का समय भी बचेगा
हाई कोर्ट ; कोर्ट ने कहा है कि निरर्थक अर्जियां दाखिल करने वालों को भारी हर्जाना लगेगा ,ऐसी अर्जिओं के कारण अदालत का समय बर्बाद होता है ,ऐसी ही एक अर्जी को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता प़र ३० हजार रूपये का हर्जाना लगाया ,जस्टिस वी बी ,गुप्ता ने कहा कि बिना मृत के अर्जी दाखिल करने वालो के खिलाफ सख्ती से निपटा जाना चाहिए ,हाई कोर्ट ने अर्जी का निपटारा करते हुए उक्त टिप्पड़ी की ,जिसमे निचली अदालत के एक फैसले को ११ साल बाद हाई कोर्ट में चुनोती दी ,

Tuesday, July 20, 2010

क्रिमिनल केस,बेल मेटर,फिर बाहरी वकील,लोकतंत्र को ख़तरा

सभी क्रिमिनल केस स्टेट के अंतर्गत आते हैं ,उनके लिए पब्लिक प्रोसिक्यूटर नियुक्त होते हैं जिनका कार्य सरकार कि तरफ से मुकद्दमा लड़ना होता है और प्रत्येक क्रिमनल व्यक्ति की बेल रुकवाना या सम्पूर्ण मुकद्दमे कि पैरवी करना होता है ,प़र आज प्रचलन में है कि सामने वाली पार्टी भी एक एक नहीं बल्कि कई कई वकील अपने सामर्थ्य के अनुसार खड़े कर देता है ,जो कि पूर्णतया गलत है क्योंकि इन बाहरी वकीलों का काम मुकद्दमे को उलझाना होता है और दूसरा काम अपराधी व्यक्ति के बेल को रुकवाकर ,उस व्यक्ति कि समाज में बेइज्जती करता है और झूठ बोलकर ,न्यायालय का कीमती वक्त बर्बाद करता है ,इसलिए मेरी सरकार से प्रार्थना है कि इस सबको बंद किया जाए और जैसा कि पहले था कि कोर्ट में केवल सरकारी वकील ही मुकद्दमा लड़ता था और दूसरा वकील बचाव पक्ष का होना चाहिए ,इससे ज्यादा कि जरूरत भी नहीं है ,tabhi लोकतंत्र कि रक्षा ho सकेगी वरना तो desh का लोकतंत्र से विश्वास ही उठ जाएगा क्योंकि इससे तो केवल पैसे वाला आदमी अधिक वकील करके ना तो गरीब आदमी कि बेल होने देगा और नाही कभी केस जीतने देगा ,
मैं खुद एक ऐसे आदमी को जानता हूँ जो कि खुद बहुत बड़ा क्रिमिनल है ,प़र वो शरीफ आदमियों कि प्रापर्टी हड़पने के लिए या ब्लैक मेल करने के लिए उनपर केस बनवा देता है जोकि दिल्ली में आसानी से हो जाता है पुलिश वाले पैसे लेकर शरीफ आदमियों प़र ही क्रिमिनल केस दायर करते है ,और फिर ये आदमी कोर्ट कई कई वकील पैसे के बल प़र खडा करके उनकी जमानत भी नहीं होने देता ,पुलिश ,वकील और ये प्रापर्टी ग्राब्बर ,तीनो मिलकर उस शरीफ आदमी को टाँगे रखते है और जज महोदय को समझ नहीं आने देते कि वो क्या करे ,क्योंकि ऍफ़ ,आई ,आर ,भी ऐसे तोड़ मरोड़ कर बनाई जाती है कि जो केस को सुलझने ही नहीं देती ,धाराएं भी इतनी भयंकर लगा देते हैं कि जज साहब समझते हैं कि सामने खडा व्यक्ति बहुत बड़ा अपराधी है जब कि वो व्यक्ति समाज का सम्मानित व्यक्ति होता है ,प़र जज साहब तो पुलिश वाले कि रिपोर्ट को ही देखते हैं और बेल केंसिल करते जाते हैं जिससे कि वो व्यक्ति जेल में ही सड़ता रहता है और जब इन लोगों का काम हो जाता है तो उस केस को ढीला छोड़ देते हैं

Monday, July 19, 2010

न्यायालयों में सी ,सी ,टी,वी कैमरे/ रिकार्डिंग

जनता जनार्दन और चीफ जस्टिस ,एवं सरकार नहीं जान पाती जो कि न्यायालय के बंद कमरे में होता है यदि उसको पूरी तरह उजागर करना है और पारदर्शी बनाना है तो सरकार को चाहिए कि वो उसकी ,क्या बल्कि प्रत्येक केस कि रिकार्डिंग होनी चाहिए कि वहाँ प़र वकील और जज क्या क्या बोलते हैं और कैसा फैसला देते है क्योंकि ज्यादातर लोगों को यही शिकायत रहती है कि अन्दर क्या होता है या हो रहा है वो नहीं जान पाते यदि भविष्य में किसी को शिकायत हो तो क़ानून कि रक्षा या उस व्यक्ति के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए सभी न्यायालयों के सभी कमरों में सी सी टी वी कैमरे लगे होने चाहिए ,ताकि किसी को शिकायत होने प़र उसको कोर्ट कि पूरी कार्यवाही से परिचित कराया जा सके ,
यदि ऐसा करा दिया गया तो उसके क्या क्या लाभ होंगे
१ भर्ष्टाचार को समाप्त करने में मदद मिलेगी क्योंकि अक्सर देखा गया है कि कोर्ट में ,जज से नीचे के कारिंदे जज साहब कि मौजूदगी में ही थोड़ा सा इधर उधर को होकर या हाथ नीचे ऊपर करके ,भ्रष्टाचार को बढावा देते रहते हैं ,इसपर लगाम लगेगी जो आज के युग में सबसे बड़ा और गंभीर मुद्दा है ,
२ अक्सर सरकारी वकील और दुसरे वकील भी जज के सामने मैं मुद्दे से हट कर अलग कि बाते करते हैं और उनका व्यवहार भी कभी कभी चिताजनक होता है ,शालीनता नाम कि चीज नहीं बच पाती ,जो दिल में आता है वो जज को भी बोल देते हैं ,
३ कभी कभी देखने में आया है कि जज भी आज कुछ बोलते हैं और अगले दिन और कोई बात बोलने लगते हैं ,जैसे मैं एक उदाहरण पेश कर दूँ कि एक केस में जज जी ,एस सस्तानी जी ने पहले दिन कहा कि कल तुम जी ,पी ,ऐ ,और हाउस टैक्स कि रसीदे और बिजली पानी के कागज़ ले आओ तो मैं तुमाहारी बेल का निपटारा कल ही कर दूंगा ,और जब अगले दिन सभी लोग सभी वकील ,आई ,ओ ,उनके कोर्ट में पहुंचे तो वो साफ़ मुकर गये कि उन्होंने तो किसी को नहीं बुलाया और सबको ताल दिया ,यदि वहाँ प़र कमरे लगे होते तो ये सबकी नौबत ही नहीं आती
और भी बहुत सी ऐसी बाते हैं जिनके ऊपर जज महोदय अमल नहीं करते और ना जाने कितने ही शरीफ और सम्मानीय व्यक्तियों के साथ चोर और बदमाशों के साथ जैसा व्यवहार केवल ये सोच कर ,करते हैं कि क्योंकि वो किसी आई ,ओ अथवा किसी ओफ्फिसर कि मनमानी का शिकार होकर जज साहब के सामने अपराधी के रूप में खडा है जब कि वास्तव में वो अपराधी नहीं है ,उस व्यक्ति को किसी भी कोर्ट में बोलने तक का अधिकार नहीं है ,कि वो अपनी सही बात जज को कह सके ,उसे पहले ही वकीलों और पुलिश वालों के द्वारा मुंह बंद करने का निर्देश होता है ,यद्यपि आजकल कोर्ट्स में मिडीएशन का दौर है ,परन्तु वो सफल नहीं हैं क्योंकि उसका कोर्ट कि कार्यवाही प़र कोई असर नहीं पड़ता ,दूसरा मुख्य कारण होता है कि वकील अपने अपने क्लाइंट को पहले ही बता देते हैं कि वहाँ कुछ नहीं होना इस लिए तुम अपनी बात प़र अड़े रहना तो भला फैसला कैसे होगा इस लिए अधिकतर केसेस में असफलता ही हाथ लगती है ,और रिकार्डिंग ना होने कि वजह से क्लाइंट और उसका वकील जो आज बोलता है अगले दिन मुकर जाता है
४ न्यायालयों में बहुत सारे जज ऐसे भी हैं जिन के भाई ,बंधू मित्र और बापू श्री तक उन ही न्यायालयों में आफिसर हैं अथवा प्रक्टिस करते हैं और ये बात सभी जानते है और इन सबका फायदा ये खूब उठानाजानते हैं जिससे कि न्याय प्रकिर्या में दोष उत्त्पन्न हो जाते हैं और न्याय मांगने वाले को ठीक न्याय नहीं मिल पाटा

Tuesday, July 13, 2010

नेताओं,मंत्रियों,राज्यपालों,मुख्यमंत्रियों,पी,एम्और प्रेसिडेंटके सिफारिशी पत्र

उपरोक्त सभी राजनीतिज्ञों ,का पद और कार्य बहुत बड़ा और कार्य बहुत अधिक होता है इस लिए ये बहुत व्यस्त होते हैं ,तो सम्पूर्ण कार्य स्वयम तो कर नहीं सकते ,अपने अपने विभागों के अलावा ,अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के काम और उनकी सेवा ,उसके अलावा देश कि जनता कि सेवा ,बहुत से काम इनको करने पड़ते हैं और ये भी एक सत्य है कि इतने सारे काम ये चाहकर भी नहीं कर सकते ,तो इसके लिए सरकार ने इनकी हेल्प के लिए २ से ५ प्रशासनिक सेवा के ब्युरेक्रेट,यानी कि वो आई ऐ ,एस ,या अई ,आर, एस ,अथवा आई ,पी ,एस,रेंक के होते हैं ,और उनमे से ही सेक्रेटरी,जाइंट सेक्रेट्री ,और प्रिंसिपल सेक्रेट्री ,नियुक्त होते है ,सम्पूर्ण विभाग का कामकाज देखना इन्हीं ऑफिसर्स का काम होता है क्योंकि राज्यपाल ,मुख्यमंत्री ,या मंत्रियों के पास तो समय ही नहीं होता कहने का तात्पर्य है कि सभी महत्त्वपूर्ण विभागों को ये ही देखते हैं वैसे भी सरकार ये ही चलाते है ,बाकी सबका तो केवल नाम ही होता है
अब आप इनका कार्य और कार्य करने का तरीका देखिये ,इनके पास प्रितिदीन हजारों कि तादाद में पत्र आते हैं ,और सेकड़ों कि तादाद में जनता जनार्दन कम और छुटभैये नेता बहुत आते हैं जिनका मुख्य कार्य होता है पैसे खा पीकर जनता जनार्दनका,अथवा अपना भी, प्रत्येक काम चाहे वो सही हो अथवा गलत ,इनसे जबरदस्ती और ऊपर से प्रेस्सर डलवाकर ,मंत्री से लेकर प्राधानमंत्री या राष्ट्रपति तक का हवाला देकर या अंतिम हथियार उनके सामने रो धोकर ,पैरों में पड़कर या मिमियाकर ,जैसे भी हो ये एकतरफा काम करा लेते हैं ,या इनसे किसी भी विभाग के लिए काम करवाने के लिए विभाग के लेत्तर हेड प़र सिफारिशी पत्र ले लेते हैं ,उस पत्र को देखते ही सम्बंधित विभाग ,गलत सलत कैसे ही कार्य को सही कर देता है ,इन पत्रों का दुखद पहलू देखिये ,
ये सभी सिफारिशी पत्र बिना दूसरी पार्टी को बुलाये या पूछे बगेर ,एकतरफा दिए जाते है जिनका दुष्परिणाम होता है कि इसमें ९०%शरीफ और इमानदार ,अराज्नेतिक लोग मर जाते है ,जिसमे ये नेता लोग उन पत्रों के सहारे कितने ही लोगों की प्रापर्टी तक दिल्ली विकाश प्राधिकरण ,एम् सी दी ,वक्फ बोर्ड कि अथवा दिल्ली सरकार तक कि जमीनों को भी हथिया लेते हैं ,और ना जाने कितने मासूमों को जेल में भेज कर चक्की तक पिसवा देते हैं और कई बार इन केशों के बारे में विभाग के मंत्रियों तक को पता नहीं होता जब कि दस्तखत सभी पत्रों प़र मंत्रियों के ही होते हैं प़र पत्र इतने होते हैं कि मंत्री जी तो उतने पत्र देख भी नहीं पाते होंगे ,
और ये छुटभैये ,नेता ,अथवा बदमाश लोग (जो इसी प्रकार के )कार्य निजी लाइजन वर्क के लिए भी करते हैं ,उस एक पत्र का रेफरेंस अपने प्रतेक पत्र में देकर ,अपने प्रत्येक पत्र के ऊपर लिखते हैं फला मंत्री जी ,या एल ,जी ,अथवा एम् ,एल ,ऐ ,या सांसद रेफरेंस ,और जहां भी जाते हैं वहाँ सबसे पहले इनके पत्र को ही दिखाते हैं जिससे कि पत्र देने वालों कि छवि तो खराब होती ही है क्योंकि इनके गलत काम को करने वाले तो यही सोचते होंगे कि कहीं इस गड़बड़ घोटाले में ऊपर वालों का साझा भी होगा ,ये लोग वैसे भी ऊपर वालों से अपने सम्बन्ध अच्छे होने कि शेखी बघारते हैं
मजे कि बात ये है कि जब उसी काम को कराने के लिए वो आदमी खुद पहुंचता है और अपने साथ हुए धोखे कि कहानी और छुटभैये कि बेईमानी कि कहानी सुनाता है तो उनको लगता है कि काम गलत हो गया ये फिर उस आदमी को भी पत्र दे देते हैं ,जब उस पत्र को लेकर आदमी सम्बंधित विभाग के पास जाता है तो वो ये कहकर ताल देते हैं कि हम तो ये काम पहले कर चुके ,हमें क्या पता कि वो गलत था या सही ,प़र कोई तत्व नहीं निकलता और ये पत्र एक आदमी कि जीवन भर कि जमा पूँजी को खा जाता है ,
तो आदरणीय सरकार को चालकाने वालो आपसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि यदि आपको पत्र इस्सू करने का इतना ही शौक है या तुम्हारी मजबूरी बभी है तो कम से कम दूसरों के अधिकारों का हनन ,या किसी शरीफ को म्रत्यु लोक तो मत भेजो ,कम से कम पत्र इस्सू करने से पहले एक बार दूसरी पार्टी से भी ,बुलाकर पूछो कि भाई तुम क्या चाहते हो अथवा सामने वाला आदमी सही है या गलत ,
यदि भविष्य में ऐसा नहीं होता तो ये सब लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध होगा और भारत में लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाएगा

Sunday, July 11, 2010

अब न्यायपालिका ने भी माना,ला एंड ऑर्डर के हालात खराब

एडिसनल सेसन जज कामिनी ला ने माना और कहा कि देखने में आ रहा है कि" ला एंड ऑर्डर "कि स्थिति काफी खराब हुई है ,और नए जेनरेशन के लोग वारदातों को अंजाम दे रहे हैं "परन्तु मैं मेडम यहाँ ये जरूर कहना चाहूँगा कि नए ही नहीं बल्कि पुराने लोग भी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं ,इसी कारण समाज में आतंक का माहोल छाया हुआ है ,उन्होंने कहा कि क्रिमिनल ,लोगों को ह्त्या तक कि धमकियां देते रहते हैं ,और बिना किसी कि परवाह किये शरीफ ,बेगुनाहों ,गरीब और असहाय ,और इज्जतदार ,लोगों को धमकिया देते रहते हैं ,"मैं यहाँ प़र ये खुद काना चाहूँगा कि इन के हाथ और रसूख काफी ऊपर तक यानी कि नेताओं ,और पुलिश तक हैं इसलिए इनकी निगाहें जिस प्रापर्टी प़र भी पड़ जाती है ये शाम दंड भेद अपनाकर उस को लेकर ही मानते है या उसके मालिक को किसी भी कानूनी चाल में फंसाकर उस प़र ऍफ़ ,आई ,आर, तक करवा देते है और फिर उसको जेल का भय दिखाकर ,उससे ब्लैक मैलिंग करते हैं यदि वो नहीं मानता तो उसके साथ कुछ भी कर देते हैं ,प़र प्रापर्टी लेकर छोड़ते हैं या फिर मुकद्दमा आदि डालकर प्रापर्टी को कहीं का नहीं छोड़ते ,और बीसियों साल तक के लिए मामला लटका देते हैं और इनकी पूरी कोशिश होती है कि पार्टी को जेल में भेजकर उसकी समाज में झूठ बोलकर गुड विल खराब करते हैं ,
और जेल में भेजने के लिए पुलिश और न्यायपालिका ही इन क्रिमिनल्स कि मदद करती है ,अब आप कहेंगे कि कैसे ,तो सबसे पहले तो पुलिश शरीफ और इजजत्दार आदमी को घर से उठवा लेती है और अगर वो नहीं मिलता है तो उसके वारंट निकलवा देती है ,और बड़े बड़े उसके फोटो ,और इस्तहार समाचार पत्रों में छपवा देती है और यदि वो कोर्ट में खुद सरंडर कर देता है तो भी उसे पुलिश कस्टडी के नाम प़र न्यायपालिका से मांग लेती है और वहाँ बैठे न्यायाधिकारी ,बिना सोचे समझे ,केवल पुलिश कि लगाईं अनुचित धाराएं देखकर ,उसे पुलिश को सौंप देते हैं और फिर वोही पुलिश कि तीसरी डिग्री का इस्तेमाल होता है और एक झूठी कहानी सुनाकर और उसे लिख कर कागज़ तैयार करके कोर्ट में पेश कर देते हैं और कोर्ट उसे फिर बिना सोचे समझे ,या उसके वकील कि बात बिना सुने ,,और अभियुक्त के बारे में भी बिना जानकारी लिए ,जज साहब जुडीसियारी के अंतर्गत कम से कम १४ दिन के लिए जेल भेज देते है और फिर ये बार बार भी कई दफे चलता है औरक्योंकि केस स्टेट का होने के बावजूद भी धन के बल प़र दो ,दो ,या तीन तीन ,सीनियर वकील खड़े कर देते है जिनका काम होता है उस शरीफ आदमी कि बेल ना होने देना ,और वो जब तक बेल नहीं होने देते जब तक कि वो उस प्रापर्टी या उसके बदले में मनमानी रकम उसके घर वालो से वसूल नहीं कर लेते तो ये लोग क़ानून का पुलिश का सहारा लेकर सफ़ेद पोशी की बदमाशी करते हैं और क़ानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाटा ,इस सबके कारण भी जनता में ला एंड ऑर्डर के प्रति गलत सन्देश जाता है ,जिसके आज जनता पुलिश और कोर्ट कचहरी जाने में सकुचाती है ,प्रत्येक आदमी आज कहता घूम रहा है कि क़ानून वानूं यहाँ कुछ भी नहीं है तो जज साहब आज न्याय और पुलिश केवल पैसे वालों या सफ़ेद पोश बदमाशों के लिए है ,आज भारत कि जनता का जुडीसिएरी से भी विश्वास उठ चुका है

फारेंसिक साइंटिफिक लैब(ऍफ़,एस,एल) की रिपोर्ट संदेहात्मक

अब ऍफ़ ,एस, एल ,कि रिपोर्ट कि प्रमाणिकता प़र ऊंगलियाँ ही नहीं बल्कि पूरे हाथ तक उठने लगे हैं ,प्रत्येक व्यक्ति उस प़र संदेह करता है ,क्योंकि ये रिपोर्ट अब क़ानून को सही फैसला करने देने में मात्र बाधा के कुछ भी नहीं है वैसे भी दस्तखत आदि के केश में ये फारेंसिक ना होकर मात्र ओपिनियन है और वो ओपिनियन भी उन सरकारी आदमियों का है जिसपर कि आसानी से यकीन नहीं किया जा सकता ,क्योंकि मेरी निगाह में तो ऐसा कोई भी सरकारी कार्यालय नहीं है जिस प़र ऊँगली ना उठाई जाती हो ,फिर यहाँ तो रिपोर्ट कैसे बनती हैं आज देश का प्रत्येक सजग व्यक्ति जानता है ,और फिर भी न्यायाधिकारी इस कि रिपोर्ट देखकर अपना फैसला देते हैं या किसी कि जमानत अर्जी को केंसल करते हैं तो उस व्यक्ति के साथ तो अन्याय है ही ,परन्तु लोकतंत्र के लिए भी ख़तरा है
वैसे भी ये संस्था कहने को तो सरकारी है प़र चलती प्राइवेट हाथो से ही है ,और राज्य सरकार के अंतर्गत रहकर काम करती है ,इसलिए ये राजनीतिज्ञों ,छुटभैये नेताओं ,दिल्ली पुलिश ,और राज्यसरकार के अधिकारियों जैसे कि सेक्रेट्री ,जोइंट सेक्रेट्री ,प्रिंसिपल सेक्रेट्री के हाथो कि कठपुतली है ,उपरोक्त लोग जैसा चाहते है ,वैसा काम इस संस्था से करा लेते हैं ,अब सोचिये ऐसी संस्था कभी निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार कर सकती है ,जिससे कि न्याय पाने वाले को उचित न्याय मिल सके ,इस लिए हम कह सकते हैं कि इस देश में न्याय पाना मुश्किल है क्योंकि हमारे देश कि न्यायपालिका तो इस संस्था कि रिपोर्ट प़र आँख बंद करके भरोसा करती है ,प़र आज ये सब वास्तविकता से बहुत परे है ,
यदि ये संस्था सही कार्य नहीं करती और जनता का भरोसा इससे उठ चुका है या ये भी भ्रष्टाचार में लिप्त है तो क्यों ना इसको बंद कर दिया जाय ,या फिर इसकी प्रमाणिकता को भी सही मायने में परखा जाय ,और न्यायादिश उचित न्याय देने के लिए और कोई उपाय सोचे या फिर इस संस्था प़र कड़ी निगरानी राखी जाय ताकि रिपोर्ट निष्पक्ष आ सके ,
देश के उच्चतम न्यायालय कि तरह निचले कोर्ट्स को भी बजाय रिपोर्ट के और कागज़ आदि या जिस व्यक्ति प़र मुकद्दमा डाला गया है ,उसकी हैसियत ,उसका चरित्र ,उसकी मल्कियत ,उसकी समाज में छवि ,आदि को भी देखकर फैसले किये जाएँ ,ये नहीं कि एक चोर या बदमाश आदमी ने किसी शरीफ आदमी को क्रिमिनल बनवा दिया और कोर्ट ने उसको टांग दिया ,ये न्याय सांगत नहीं है ,कुछ बदमाश लोग नकली आदि कागज़ बनाकर भी लोगो कि प्रापर्टी हड़पने के लिए या उसको ब्लेकमेल करने के लिए ऐसे ही दवाब बनाते या बनवाते हैं ,
हमारी न्यायाधीशों से करवद्ध विनती है कि न्यायालयों में सबके भगवान् आप लोग ही हो यदि आपका फर्ज बनता है कि आप सबको उचित न्याय प्रदान करें तो आपकी असीम क्रपा होगी और लोकतंत्र भी मजबूत होगा ,

Wednesday, July 7, 2010

इन्वेस्टीगेसन ऑफिसर (आई ,ओ) से बड़ा कोई नहीं ?

जी हाँ ,भारत के लोकतंत्र के लिए सब से बड़ा ख़तरा (आई ,ओ )है क्योंकि इससे बड़ा हिन्दुस्तान में नाही तो कोई जज या कमिश्नर ,राज्यपाल ,मुख्यमंत्री ,प्रधान मंत्री ,अथवा राष्ट्रपति या कोई भी देश का बड़े से बड़ा नेता है ,क्योंकि वो अपनी रिपोर्ट में जिसके खिलाफ भी लिख देगा उसको कोई भी काट नहीं सकता और वो सबकुछ जब लिखता है जब आप या कोई भी उसके मनमुताबिक सेवा या उसकी बात नहीं मानता ,और जितने पढ़े लिखे और समझदार लोग हैं वो ना तो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं और नाही उनकी बेकार में सेवा करते हैं क्योंकि वो एक आई ,ओ ,कि पावर के बारे में नहीं जानते ,जिसका परिणाम होता है कि ज्यादातर ऍफ़ आई आर इन शरीफ आदमियों के नाम मेंही होती हैं ,इसी लिए पिछले काफी समय से देखने में आ रहा है कि ज्यादातर ये अच्छे लोग ही जेल कि हवा खा रहे हैं ,आये दिन ना जाने कितने शरीफ आदमियों के विरुद्ध ऍफ़ आई आर पुलिश तानो में हो रही हैं ,
एक आई ,ओ का रेंक हवालदार से लेकर सब इन्स्पेक्टर ,या इन्स्पेक्टर का होता है ,इसलिए इनकी क्वालिफिकेशन भी १० वी से लेकर १२ वी या किसी कि ग्रेजुएट होती है और वो भी अभी कुछ समय से शुरू हुई है ,इसलिए इनको क़ानून कि जानकारी तो होती ही नहीं या ना के बराबर होती होगी ,इसलिए वो ज्यादातर तो धाराओं के लिए शिकायतकर्ता के वकील से ही संपर्क करते हैं या उनसे ही पूरी कि पूरी रिपोर्ट तैयार करवाते हैं अब आप सोचिये कि वकील साहब तो अपने क्लाइंट के मुताबिक़ ही धारा लिख कर देगा और वो भी इतनी और ऐसी धारा लगाएगा कि आदमी जिन्दगी भर लगा रहे तो भी जान नहीं छुडा सकता क्योंकि आगे जज साहब ने तो धाराए देखकर फैसला देना है ,जज साहब भी ये न अहिं देखते कि सामने वाला कहीं शरीफ आदमी ही को जेल तो नहीं भेजा जा रहा है क्योंकि उन्होंने तो क़ानून के मुताबिक़ चलना है और क़ानून कहता है कि जो आई ,ओ ने लिख दिया वो ही सही है ,अब चाहे पुलिश कस्टडी नहीं भी मांगती है तोजुडिसियल कस्टडी के नाम प़र भी एक बार तो शरीफ आदमी को जेल में भेज ही दिया ,अब चाहे समाज में उसकी बेइज्जती हो या मजाक उड़े और बेईमान आदमी बाहर रहकर उसकी फजीहत करता रहता है समाज उसको अपराधी समझ कर अच्छा बर्ताव नहीं करता ,उसके साथ साथ उसके बच्चों का भविष्य भी खराब हो जाता है इस सबके बावजूद ,सब कुछ देखते हुए भी कोई भी जज कभी भी शायद किसी आई ,ओ को बुलाकर ये नहीं पूछता कि भाई ये धाराएं किस आधार प़र लगाईं गई हैं ,या एक बार ४२० धारा लगा दी तो ३६७ या ३६८ या ३७१ अथवा १२०बी ,स्वत: ही लग गई या इसी तरह दुसरे कैसों में भी होता है इसी तरह बेमतलब में धाराएं लगा दी जाती हैं ,इन सब धाराओं को लेकर मैंने खुद एक असिस्टेंट कमिश्नर को कहा तो उनका जवाब था कि क्या अब पुलिश धारा भी आप से पूछकर लगाएगी ,और आगे वो कुछ सुनने को तैयार नहीं थे ,बोले जो आई ,ओ ने कर दिया बस वो ही सही है ,
अब आप उस ऍफ़ आई आर ,को लेकर देश के बड़े बड़े कानूनविदों ,मंत्रियों ,या हाई कोर्ट्स के जजों अथवा सुप्रीम कोर्ट के जजों या जनता के पास चले जाओ कोई भी आपकी सहायता नहीं कर सकता ,आब तो आपको क़ानून में दायरे में रहकर ही सब कुछ सहन करना ही पडेगा ,में दिल्ली में एक ऐसे आई ,ओ ,को भी जानता हूँ जो स्वयम को सबसे बड़ा क़ानून का ज्ञाता मानता है और बड़े बड़ों को जेल कि हवा खिलाने में महारथी मानता है ,यदि इसी तरह ये आई ओ ,शरीफ और अच्छे लोगो को जेल भेजते रहेंगे और बदमाश या गुंडे मवालियों को बचाते रहेंगे तो वो दिन दूर नहीं है जब भारत का लोकतंत्र खतरे में पद जाएगा और लोकतंत्र खतरे का मतलब देश कि जनता के साथ विश्वासघात ,
अभी भी समय है जब कि इस सब प़र लगाम कासी जा सकती है ,क़ानून अपने आप में सही है प़र आज उसका दुरूपयोग हो रहा है और जब जब भी क़ानून का दुरूपयोग हुआ है क्रान्ति आई है और फिर जो कुछ होता है या हुआ है देश कि जनता सब जानती है इसलिए यदि क़ानून का दुरूपयोग रोकना है तो देश में जितने भी आई ,ओ नियुक्त किये जाते हैं कम से कम उनको क़ानून का ज्ञाता तो होना ही चाहिए यानी के उनके पास क़ानून कि डिग्री तो होनी ही चाहिए वरना तो जो खिलवाड़ ,क़ानून के साथ और देश कि आम जनता के साथ हो रहा है हमेशा कि तरह चलता ही रहेगा और देश का प्रत्येक शरीफ आदमी रगड़े खाता रहेगा
इस सबके लिए भारत कि लोकतांत्रिक सरकार को भी सोचना चाहिए और यदि अभी भी ना सोचा गया तो इन्सबके परिणाम घातक ही होंगे